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बार-बार जमानत मांगने पर हाईकोर्ट सख्त: फोरम शॉपिंग पर अदालत की टिप्पणी, कही ये बात

Sat, 10 Oct 2026 08:10 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

फोरम शॉपिंग का अर्थ है अपनी मांग के पक्ष में अनुकूल आदेश हासिल करने के लिए अलग-अलग अदालतों या पीठों का रुख करना। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल एक ही राहत के लिए बार-बार नहीं किया जा सकता है।
 
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने लगातार जमानत याचिकाएं दायर करने की प्रवृत्ति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि परिस्थितियों में कोई ठोस बदलाव नहीं था। इसके बावजूद बार-बार जमानत मांगना फोरम शॉपिंग की श्रेणी में आ सकता है। फोरम शॉपिंग का अर्थ है अपनी मांग के पक्ष में अनुकूल आदेश हासिल करने के लिए अलग-अलग अदालतों या पीठों का रुख करना। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल एक ही राहत के लिए बार-बार नहीं किया जा सकता है।

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याचिकाकर्ता मॉरिसन लॉयल उर्फ मॉरिसन उर्फ निशु पर एक महिला की निजी तस्वीरें और वीडियो सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित करने का आरोप है। याचिकाकर्ता ने अग्रिम जमानत की मांग करते हुए दावा किया कि उसे पड़ोसियों के साथ विवाद के कारण झूठा फंसाया गया है। उसने यह भी दलील दी कि पहले की जांच में उसके खिलाफ कुछ आपत्तिजनक नहीं मिला था। संबंधित मोबाइल नंबर भी उसका नहीं होने की बात कही गई। 

हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। उसकी पहली याचिका 1 अक्तूबर 2026 को गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दी गई थी। इसके बाद दूसरी याचिका में उसने दलील दी कि पहली सुनवाई के दौरान वह जांच अधिकारी की बात का जवाब नहीं दे पाया था। हालांकि, अदालत ने इसे परिस्थितियों में कोई ठोस बदलाव नहीं माना।
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बार-बार याचिकाएं दायर करने के लिए परिस्थितियों में बदलाव जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि लगातार जमानत याचिकाएं दायर करना अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है। परंतु इसके लिए परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव होना जरूरी है। केवल पहले से उपलब्ध तथ्यों को दोहराना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। मामूली आधार पेश करना भी पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियों में वास्तविक और महत्वपूर्ण बदलाव होने पर ही दोबारा जमानत याचिका दायर करने पर विचार किया जा सकता है। किसी आदेश से असंतुष्ट पक्ष को कानून के अनुसार उचित न्यायिक मंच पर राहत मांगनी चाहिए। एक ही राहत के लिए बार-बार याचिकाएं दायर नहीं करनी चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

मॉरिसन लॉयल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
मॉरिसन लॉयल उर्फ निशु पर एक महिला की निजी तस्वीरें और वीडियो सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित करने का आरोप है। उसने अग्रिम जमानत के लिए दावा किया कि उसे पड़ोसियों के विवाद के चलते झूठा फंसाया गया है। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पिछली जांच में उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली थी। उसने यह भी कहा कि जिस मोबाइल नंबर से सामग्री प्रसारित हुई, वह उसका नहीं है। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को परिस्थितियों में ठोस बदलाव नहीं माना। मामले में आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रखा गया। प्रभावी जांच के लिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को भी महत्वपूर्ण माना गया। इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने मॉरिसन को अग्रिम जमानत देने से इन्कार कर दिया। अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी। पीठ ने साथ ही स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष या जांच पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा।
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