इस्तीफे में भी छात्रा ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि वह लगातार हो रहे दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के कारण संस्थान छोड़ने के लिए मजबूर है। आईआईटी रोपड़ ने तर्क दिया कि छात्रा पहले भी कई फैकल्टी सदस्यों और छात्रों के खिलाफ शिकायतें करती रही है। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि यह तर्क मामले के मूल प्रश्न से संबंधित नहीं है। कोर्ट ने पाया कि छात्रा के खिलाफ कभी कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई और न ही उसे कोई नोटिस जारी किया गया।
इसके बावजूद शिकायत की जांच किए बिना उसी दिन इस्तीफे की अनुशंसा, समर्थन और स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया पूरी कर दी गई। संस्थान की कार्रवाई से यह प्रतीत होता है कि वह छात्रा की शिकायतों का समाधान करने के बजाय उससे छुटकारा पाने की जल्दी में था।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस्तीफे की भाषा स्वयं यह दर्शाती है कि यह सामान्य या स्वैच्छिक इस्तीफा नहीं था, बल्कि परिस्थितियों से मजबूर होकर लिया गया निर्णय था। फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने आईआईटी रोपड़ के निदेशक से अपेक्षा जताई कि वे ऐसा शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करें, जिसमें छात्रा बिना किसी बाधा के अपनी शोध और पीएचडी पूरी कर सके।