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HC: पिता की बेटे को दी गई जमीन को मां ने वापस मांगा, अपील खारिज; गुजारा भत्ते को लेकर दिया ये निर्देश

Thu, 25 Jun 2026 06:22 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा-23 का उद्देश्य उन बुजुर्गों को संरक्षण देना है, जो अपनी संपत्ति इस शर्त पर किसी को हस्तांतरित करते हैं कि बदले में उनकी देखभाल और भरण-पोषण किया जाएगा।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक महत्वपूर्ण फैसले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी संपत्ति का हस्तांतरण स्वयं वरिष्ठ नागरिक ने नहीं, बल्कि उसके पति ने किया हो तो वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा-23 के तहत उस हस्तांतरण को रद्द नहीं कराया जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि मृतक पति की संपत्ति से बुजुर्ग पत्नी को भरण-पोषण प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार है।
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बुजुर्ग महिला का बढ़ाया गुजारा भत्ता
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बठिंडा निवासी एक बुजुर्ग महिला को मिलने वाला मासिक गुजारा भत्ता 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया। साथ ही बेटे को चार महीने के भीतर बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया।

साल 2011 में बेटे के नाम की थी जमीन
महिला ने अपीलीय प्राधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसके बेटे के नाम की गई 40 कनाल जमीन वापस करने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया गया था। महिला के पति ने वर्ष 2011 में अपनी 118 कनाल 15 मरला कृषि भूमि अपने बेटे दविंदर सिंह के नाम हस्तांतरित कर दी थी। बाद में महिला ने आरोप लगाया कि बेटा उसकी देखभाल नहीं कर रहा है और उसने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा-23 के तहत जमीन का हस्तांतरण रद्द करने की मांग की। 
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मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने बेटे को 10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने के साथ-साथ 40 कनाल जमीन महिला के नाम करने का आदेश दिया था। लेकिन बेटे की अपील पर अपीलीय ट्रिब्यूनल ने यह आदेश रद्द कर दिया और कहा कि जमीन का हस्तांतरण महिला ने नहीं, बल्कि उसके दिवंगत पति ने किया था। 

हालांकि ट्रिब्यूनल ने मां को भरण-पोषण देने और उसके रहने की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के आदेश को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा-23 का उद्देश्य उन बुजुर्गों को संरक्षण देना है, जो अपनी संपत्ति इस शर्त पर किसी को हस्तांतरित करते हैं कि बदले में उनकी देखभाल और भरण-पोषण किया जाएगा।

बेटे ने अदालत को बताया कि वह चार महीने में पूरा भुगतान कर देगा। हाईकोर्ट ने अब महिला का मासिक गुजारा भत्ता बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आदेश का पालन नहीं किया जाता है तो महिला जिला मजिस्ट्रेट-सह-अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष निष्पादन याचिका दायर कर सकती है, जिस पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
 
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