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High Court: ‘कुछ दिन साथ रहने से वैध लिव-इन रिलेशनशिप नहीं बन जाता’, पटियाला के प्रेमी जोड़े को झटका

Mon, 15 Jun 2026 09:19 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

युवती का परिवार उनके संबंध का विरोध कर रहा है और युवक को झूठे केस की धमकी दे रहा है। इसी आशंका के चलते उन्होंने पुलिस सुरक्षा की मांग की थी। 
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लिव-इन रिलेशनशिप - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पटियाला के एक प्रेमी जोड़े की सुरक्षा संबंधी याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि कुछ दिन साथ रहने भर से वैध लिव-इन रिलेशनशिप नहीं बन जाता। घर से भागकर साथ रहने वाले बच्चों के कारण परिवार की प्रतिष्ठा, सम्मान और माता-पिता की गरिमा प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रदान करते समय अदालत को व्यापक सामाजिक प्रभावों पर भी विचार करना पड़ता है।
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याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया था कि दोनों बालिग हैं, एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और भविष्य में विवाह करना चाहते हैं। फिलहाल वे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। उनका आरोप था कि युवती का परिवार उनके संबंध का विरोध कर रहा है और युवक को झूठे केस की धमकी दे रहा है। इसी आशंका के चलते उन्होंने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
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मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कुछ दिनों तक साथ रहने से किसी संबंध को वास्तविक और स्थापित लिव-इन रिलेशनशिप नहीं माना जा सकता। विशेषकर तब जब दोनों पक्ष स्वयं यह स्वीकार कर रहे हों कि वे भविष्य में विवाह करना चाहते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे संबंधों को हर मामले में वैधानिक संरक्षण देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि याचिकाकर्ता अपने माता-पिता का घर छोड़कर न केवल परिवार की बदनामी का कारण बन रहे हैं बल्कि अपने अभिभावकों के सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को भी प्रभावित कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय समाज में विवाह संस्था को विशेष महत्व प्राप्त है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं बल्कि सामाजिक मान्यता और कानूनी परिणामों वाला एक पवित्र बंधन है। अदालत ने टिप्पणी की कि समाज के कुछ वर्गों ने समय के साथ पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित जीवनशैली अपनाई है जो भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से काफी अलग है।

 कोर्ट ने पूर्व के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कुछ परिस्थितियों में लिव-इन संबंधों को संरक्षण देने से सामाजिक ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
 
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