पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल जान से मारने की धमकी का आरोप लगाने मात्र से किसी व्यक्ति को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। यदि सक्षम पुलिस अधिकारी विस्तृत जांच के बाद यह निष्कर्ष निकालता है कि धमकी के आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है तो हाईकोर्ट उस निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत उसकी भूमिका पर्यवेक्षी (सुपरवाइजरी) है। वह अपीलीय अदालत की तरह तथ्यों और साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।
जस्टिस मनीषा बत्रा ने फरीदाबाद निवासी दो याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिका में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने, 10 अप्रैल 2026 के पुलिस आदेश को रद्द करने और याचिकाकर्ताओं तथा उनके परिवार को सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 4 अप्रैल 2024 को पड़ोसियों ने उन पर हमला किया था, जिसके बाद एफआईआर दर्ज हुई। आरोप था कि इसके बाद आरोपी लगातार केस वापस लेने के लिए उन्हें धमकाते रहे। पहले हाईकोर्ट ने पुलिस आयुक्त को शिकायत पर कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया था। इसके अनुपालन में पुलिस ने जांच के बाद 10 अप्रैल 2026 को सुरक्षा देने से इन्कार कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाय समझौते का दबाव बनाया, जिसकी रिकॉर्डिंग उनके घर में लगे सीसीटीवी कैमरों में मौजूद है।