खेतों में रेत-घरों में संकट, किसानों के सामने आजीविका का सवाल
फिरोजपुर जिले के गांव कालूवाला के किसान मुख्तियार सिंह की कहानी इस आपदा की गंभीरता को बयां करती है। चार एकड़ जमीन वाले मुख्तियार सिंह के खेतों में छह से सात फीट तक रेत जमी हुई है। वह कहते हैं कि खेतों से रेत हटाने के लिए उनके पास संसाधन नहीं हैं। रबी सीजन में गेहूं की बुआई नहीं हो सकी और अब परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
मुख्तियार सिंह बताते हैं कि उनके पांच बच्चे हैं और घर में खाने के लिए भी अनाज नहीं बचा। बाढ़ से हुए नुकसान का मुआवजा भी अब तक नहीं मिला। उन्होंने सरकार और समाजसेवी संस्थाओं से अपील की है कि उनके खेतों से रेत हटाने में मदद की जाए ताकि वे दोबारा खेती कर सकें।
गांव के अन्य ग्रामीण जरनेल सिंह और बलवीर सिंह बताते हैं कि बाढ़ में उनके मकान गिर गए थे जो अब तक नहीं बन पाए हैं। पहले गांव के टापू पर 65 परिवार रहते थे लेकिन अब केवल 28 घर ही बचे हैं।
सतलुज किनारे अब भी रेत की मोटी परत
फाजिल्का जिले के सीमांत गांवों जैसे रेते वाली भैनी, तेजा रूहेला, गट्टी नंबर तीन, दोना नानका और मोजम में कुछ हद तक रेत हटाने का काम हुआ है। लेकिन सतलुज नदी के किनारे स्थित जमीनों पर अब भी रेत की मोटी परत मौजूद है।
किसान अंग्रेज सिंह और सोना सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने स्तर पर काफी खर्च करके खेतों से रेत हटाई है। सरकार की ओर से मशीनरी उपलब्ध कराने की बात कही गई थी लेकिन मदद सीमित ही मिल पाई।
उन्होंने बताया कि किसी तरह गेहूं की बुआई तो कर ली लेकिन उत्पादन पहले जैसा नहीं मिलने की आशंका है। रेत हटाने के बाद भी मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई है और उसे दोबारा उपजाऊ बनने में समय लगेगा।
खुद के खर्च पर खेतों को किया तैयार, फिर भी उत्पादन कम
पठानकोट जिले के किसानों का कहना है कि उन्होंने अपनी जमीन को खुद ही खेती योग्य बनाया। बाढ़ के बाद करीब पांच महीने तक लगातार मेहनत करनी पड़ी। गांव दत्याल के किसान गुरमुख सिंह बताते हैं कि उन्होंने एक किला जमीन से रेत हटाने पर 15 से 20 हजार रुपये खर्च किए। इसके बावजूद इस बार गेहूं की फसल का उत्पादन काफी कम रहा।
किसानों को अब यह डर भी सताने लगा है कि अगर इस साल फिर बाढ़ आई तो नुकसान और ज्यादा होगा। रावी नदी के किनारे बने अस्थायी बोरियों के बांध बाढ़ को रोकने में सक्षम नहीं हैं।
धान उत्पादन पर भी पड़ सकता है बड़ा असर
अमृतसर जिले में रावी नदी के आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ का असर अब भी बना हुआ है। अजनाला, लोपाल, धनोआ कलां और आसपास के इलाकों में करीब 8,000 से 10,000 एकड़ जमीन प्रभावित हुई थी।
किसान संगठनों के अनुसार लगभग 60 से 65 प्रतिशत क्षेत्र में आंशिक रूप से रेत हटाई जा चुकी है लेकिन 3,000 से 3,500 एकड़ जमीन अब भी मोटी परत के नीचे दबी है। किसान अमरीक सिंह और हरबंस सिंह बताते हैं कि रेत हटाने में 12,000 से 25,000 रुपये प्रति एकड़ तक खर्च आ रहा है। यह खर्च रेत की गहराई और मशीनरी की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
किसान नेता डा. सतनाम सिंह के अनुसार सरकार ने कुछ मशीनें भेजीं लेकिन सीमित समय के लिए। अधिकांश काम किसानों को खुद ही करवाना पड़ा। किसानों का कहना है कि आने वाले धान सीजन में उत्पादन में 30 से 70 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। रेत हटाने के बाद भी मिट्टी की उर्वरता तुरंत वापस नहीं आती।
नदी में बह गई जमीन, मुआवजा नाकाफी
कुछ किसानों के लिए स्थिति और भी गंभीर है। ससराली के किसान दविंदर सिंह नागरा की छह एकड़ जमीन बाढ़ में नदी में बह गई। उन्हें 17 हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा मिला जो उनके अनुसार बेहद कम है। नागरा बताते हैं कि उनकी जमीन अब प्राकृतिक स्तर से करीब 20 फीट नीचे चली गई है। उसे समतल करने में 10 से 12 लाख रुपये प्रति एकड़ खर्च आएगा जो उनके लिए संभव नहीं है।
किसान नेता दिलबाग सिंह के अनुसार ससराली में करीब 30 एकड़ जमीन नदी में समा गई थी। सरकार ने 20 हजार रुपये प्रति एकड़ तक मुआवजा दिया लेकिन यह नुकसान के मुकाबले बेहद कम है। उन्होंने मांग की कि मुआवजा कम से कम 50 हजार रुपये प्रति एकड़ होना चाहिए। साथ ही नदी किनारे बनाए जा रहे बांधों की गति भी धीमी है।
सरकार से बड़े स्तर पर अभियान की मांग
किसानों और संगठनों का कहना है कि रेत हटाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाने की जरूरत है। केवल अनुमति देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। मशीनरी, आर्थिक सहायता और तकनीकी सहयोग के बिना किसान इस संकट से बाहर नहीं निकल पाएंगे।
नौ माह बाद भी पंजाब के खेतों में बाढ़ के जख्म साफ नजर आ रहे हैं। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर आने वाले कई सीजन तक खेती और किसानों की आजीविका पर पड़ सकता है।