दीपावली का पर्व भले ही आज आधुनिकता और चकाचौंध से घिर चुकी हो लेकिन अमृतसर की दिवाली आज भी अपने सांस्कृतिक रंगों और सादगी भरे मूल्यों के कारण अलग पहचान रखती है।
गुरुनगरी में पीढ़ियों से सुनाई देने वाली कहावत दाल-रोटी घर दी, दिवाली अंबरसर दी... आज भी सार्थक है। यह सिर्फ कहावत नहीं बल्कि जीवन-दर्शन है जो यह संदेश देती है कि त्योहारों की असली चमक बाहर नहीं भीतर और अपनेपन में है।
स्वर्ण मंदिर परिसर, कटड़ा जयमल सिंह, गुरु बाजार, हॉल गेट, रामबाग, लॉरेंस रोड और पुराने शहर की तंग गलियों तक दिवाली की रौनक कई दिन पहले से दिखने लगती है। दीपों की पंक्तियां, कंदीलों की रोशनी और घरों में बसते उल्लास से अमृतसर त्योहार के असली स्वरूप को सहेजकर रखता है। इतिहासकारों का मानना है कि दिवाली का उत्सव इस भूमि पर सिर्फ धार्मिक भावनाओं से नहीं बल्कि स्वाभिमान, स्वतंत्रता, भाईचारे और सामूहिक खुशियों से भी जुड़ा रहा है। यहां दिवाली रोशनी का पर्व भर नहीं बल्कि समुदाय की एकता का प्रतीक भी है।
सादगी में संपन्नता की सीख
अमृतसर के बुजुर्ग आज भी बच्चों को यह कहावत सुनाते हैं कि दाल-रोटी घर दी... दिवाली अंबरसर दी। अर्थ यही है कि जीवन की मूल जरूरतें सरल हों लेकिन त्योहार अपने लोगों के बीच, अपनी धरती पर और अपनी परंपरा के साथ मनाए जाएं तभी उत्सव का आनंद पूर्ण होता है। यह संदेश आज की पीढ़ी को अनावश्यक दिखावे से दूर रहने और परिवार, परंपरा और रिश्तों की गर्मी को प्राथमिकता देने की प्रेरणा देता है। यहां की दिवाली में दिखावा कम और अपनापन अधिक है। घरों में बने व्यंजन- दाल, पनीर, पूरियां, हलवा, खीर और देसी घी के पकवान, घर का स्वाद त्योहार को जीवंत कर देते हैं।
रिश्तों में रोशनी
अमृतसर की दिवाली की खासियत है कि इस दिन दरवाजे सिर्फ दीये के लिए नहीं, पड़ोसियों और रिश्तों के लिए भी खुलते हैं। शहर में आज भी कई मोहल्लों में दिवाली सामुदायिक रूप से मनाई जाती है। बच्चे पटाखे, रंगोलियां और कंदील सजाते हैं, महिलाएं घरों की चौखट और आंगन को चमकाती हैं। पुरुष बाजार-सजावट और पूजा-सामग्री के इंतजाम में जुटते हैं। शाम होते ही सोहन हलवा, जलेबी, लड्डू और फुलझड़ियों के बीच चारों ओर बस एक ही एहसास फैलता है कि अपनापन और रोशनी एक-दूसरे की पहचान हैं।
बाजारों में खास रौनक
अमृतसर की दीपावली बाजार यूं तो हर साल रौनक और रोजगार से भर जाते हैं लेकिन शहर की आत्मा अब भी यह याद दिलाती है कि त्योहार की आत्मा खरीदारी में नहीं, सांझा खुशी में बसती है। इस वर्ष भी स्थानीय व्यापारियों ने स्थानीय खरीद, स्थानीय समृद्धि का संदेश दिया। वहीं समाजसेवी संस्थाओं ने जरूरतमंद परिवारों तक कपड़े, मिठाइयां और दीया-बत्ती पहुंचाकर दिवाली की असली रोशनी फैलाने का अभियान चलाया।
प्रकृति और सेहत के प्रति जागरूकता
शहर में पर्यावरण-हितैषी दिवाली को लेकर कई समूहों और स्कूलों ने कम आतिशबाजी और ग्रीन पटाखों का अभियान चलाया। मिट्टी के दीयों, प्राकृतिक रंगोलियों, देसी घी और सरसों के तेल से दीप जलाने की पुरानी परंपराओं को फिर बढ़ावा मिला। इस पहल का उद्देश्य यही था कि रोशनी हो लेकिन धुएं और शोर के बिना, प्रेम और शांति के साथ। दिवाली अमृतसर की आत्मा में बसती है और इस शहर की परंपरा आज भी दुनिया को एक गहरा संदेश देती है। सादगी में ही सबसे बड़ी समृद्धि है। रिश्तों में ही सबसे बड़ी रोशनी है।
मंदिरों, गुरुघरों में भीड़, दूर-दूर से आते हैं संत
दिवाली के दिन हजारों की सख्या में श्रद्धालु हरिमंदिर साहिब और दुर्ग्याणा तीर्थ जाकर नतमस्तक होते हैं। श्रद्धा और समर्पण का सबूत देते हैं। हजारों की संख्या में दिवाली व इसके आसपास के दिनों मे गुरु नगरी साधुओं से भर जाती है। दूर-दूर से संत इस पवित्र धरा को नतमस्तक करने के लिए आते है। यहां के लोग भी उनको श्रद्धा से यथा योग्य सम्मान देते हैं। यहीं अमृतसर की परंपरा और दिवाली की पहचान है।