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नौकरी छिनना कर्मचारी की आर्थिक मृत्यु जैसा: 28 साल सेवा के बाद बर्खास्तगी, HC ने दिए बहाली के आदेश

Tue, 21 Jul 2026 10:06 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

अदालत ने टिप्पणी की कि लंबे समय तक नौकरी करने वाले व्यक्ति के लिए सेवा से बर्खास्तगी केवल नौकरी समाप्त होना नहीं है, बल्कि यह उसके और उसके परिवार की आर्थिक सुरक्षा को पूरी तरह प्रभावित कर सकती है।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने करीब 28 साल तक बैंक की सेवा करने वाले कर्मचारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उसे राहत दी है।
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अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी को नौकरी से हटाने का फैसला उसके पूरे जीवन और परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर गंभीर असर डालता है। ऐसे में अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय सेवा अवधि, पूर्व आचरण और आरोपों की गंभीरता जैसे पहलुओं पर उचित रूप से विचार किया जाना जरूरी है। 

अदालत ने टिप्पणी की कि लंबे समय तक नौकरी करने वाले व्यक्ति के लिए सेवा से बर्खास्तगी केवल नौकरी समाप्त होना नहीं है, बल्कि यह उसके और उसके परिवार की आर्थिक सुरक्षा को पूरी तरह प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति को कर्मचारी की आर्थिक मृत्यु जैसा बताया गया।
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मामला केनरा बैंक के कर्मचारी से जुड़ा है, जिसे करीब 28 वर्षों तक बैंक में सेवा देने के बाद वर्ष 2009 में बर्खास्त कर दिया गया था। उस समय वह विशेष सहायक के पद पर कार्यरत था। कर्मचारी ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन किया। 

अदालत ने पाया कि कर्मचारी ने बैंक में लगभग 28 वर्ष तक काम किया था। अनुशासनात्मक आदेश और अपीलीय आदेश में उसके किसी पूर्व कदाचार का उल्लेख नहीं था। इसके बावजूद उसे सेवा से बाहर कर दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने का फैसला केवल आरोपों और विभागीय कार्रवाई तक सीमित होकर नहीं देखा जा सकता। कर्मचारी की पूरी सेवा अवधि और उसके पूर्व आचरण को भी ध्यान में रखना जरूरी है। यदि किसी कर्मचारी ने लगभग तीन दशक तक सेवा की है और उसके खिलाफ पहले कोई गंभीर शिकायत या कदाचार दर्ज नहीं है तो दंड की आनुपातिकता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
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हर मामले में सबसे कठोर दंड देना न्यायसंगत नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी को दंड तय करते समय यह देखना चाहिए कि आरोपों की प्रकृति क्या है और प्रस्तावित दंड कथित कदाचार की तुलना में कितना उचित है। हर मामले में सबसे कठोर दंड देना न्यायसंगत नहीं हो सकता। अदालत ने कर्मचारी की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया और बैंक को मामले में कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
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