अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के समर्थकों ने बुधवार को चंडीगढ़ में प्रदर्शन किया था। घटना के अगले दिन दर्ज एफआईआरमें पूर्व विधायक अजैब सिंह मुखमैलपुर का नाम शामिल कर दिया गया, जबकि उनका करीब दो वर्ष पहले 75 वर्ष की आयु में निधन हो चुका है।
खुद को हाईटेक और स्मार्ट पुलिस बताने वाली चंडीगढ़ पुलिस एक बार फिर अपनी ही कार्रवाई के कारण सवालों के घेरे में आ गई है।
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अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के समर्थकों के प्रदर्शन के बाद दर्ज एफआईआर में पुलिस ने ऐसी चूक कर दी, जिसने उसकी जांच और कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने करीब दो साल पहले दिवंगत हो चुके पूर्व विधायक एवं पूर्व मंत्री अजैब सिंह मुखमैलपुर को प्रदर्शन में शामिल दिखाते हुए नामजद आरोपी बना दिया, जबकि मौके पर मौजूद कई प्रमुख चेहरों के नाम एफआईआर में शामिल ही नहीं किए गए।
प्रदर्शनकारियों ने तोड़ दी थी बैरिकेडिंग
बुधवार को पंजाब के खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह और बंदी सिखों की रिहाई की मांग को लेकर निकले वारिस पंजाब दे के समर्थक चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री भगवंत मान की सेक्टर-2 स्थित सरकारी कोठी के नजदीक तक पहुंच गए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ी, वाटर कैनन पर कब्जा कर लिया और धक्का-मुक्की में कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पहले से घोषित प्रदर्शन के बावजूद चंडीगढ़ पुलिस न तो उन्हें शहर की सीमा पर रोक सकी और न ही संवेदनशील इलाके तक पहुंचने से रोक पाई।
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घटना के अगले दिन दर्ज एफआईआर ने पुलिस की और अधिक किरकिरी करा दी। एफआईआर में पूर्व विधायक अजैब सिंह मुखमैलपुर का नाम शामिल कर दिया गया, जबकि उनका करीब दो वर्ष पहले 75 वर्ष की आयु में निधन हो चुका है। मुखमैलपुर वर्ष 1997 में घनौर से विधायक चुने गए थे और पंजाब सरकार में मंत्री भी रहे। मामले की जानकारी सामने आने के बाद उनके परिवार ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे पुलिस की गंभीर लापरवाही बताया।
एफआईआर में विधायक मनप्रीत अयाली, लक्खा सिधाना, भाना सिद्धू समेत कई नेताओं के नाम दर्ज किए गए हैं, लेकिन जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह, जो इस पूरे आंदोलन का प्रमुख चेहरा माने जा रहे हैं, उनका नाम सूची में नहीं है। इससे पुलिस की कार्रवाई की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।