चंडीगढ़ के कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में गृह मंत्रालय से मिले जवाब के आधार पर चंडीगढ़ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि शहर की अधिकतर प्रशासनिक समस्याओं की जड़ यह है कि चंडीगढ़ ओवर-गवर्न्ड और अंडर-सर्व्ड हो चुका है। उनके अनुसार, जरूरत से अधिक वरिष्ठ अफसर तैनात होने के बावजूद विकास कार्यों और जनसेवाओं की रफ्तार संतोषजनक नहीं है।
लोकसभा में पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि चंडीगढ़ के लिए 11 आईएएस और सात आईपीएस पद स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान में यहां 12 आईएएस और नौ आईपीएस अधिकारी कार्यरत हैं। इनमें पंजाब कैडर के तीन आईएएस और एक आईपीएस, जबकि हरियाणा कैडर के दो आईएएस और एक आईपीएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं।
मनीष तिवारी ने कहा कि स्वीकृत संख्या से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि प्रशासनिक ढांचा वास्तविक जरूरत से बड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि करीब 14 गुणा 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले शहर में इतनी बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती के बावजूद फैसलों और विकास परियोजनाओं में अपेक्षित तेजी नहीं दिख रही।
उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ के प्रशासक की जिम्मेदारी निभाते हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और अधिक शीर्ष-भारी हो जाती है। तिवारी ने चंडीगढ़ को “ब्यूरोक्रेटिक पार्किंग लॉट” बताते हुए कहा कि यहां अफसरों की भरमार है, लेकिन इसका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच रहा।
सांसद ने पड़ोसी जिलों मोहाली और पंचकूला का उदाहरण देते हुए कहा कि क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से चंडीगढ़ से चार-पांच गुना बड़े इन जिलों का प्रशासन एक-एक उपायुक्त (डीसी) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के नेतृत्व में प्रभावी ढंग से संचालित हो रहा है। इसके विपरीत चंडीगढ़ में अधिक अधिकारियों के बावजूद फाइलों के निपटारे और विकास कार्यों की गति धीमी बनी हुई है। हालांकि केंद्र सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि अधिकारियों की तैनाती कार्यगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की जाती है और यह एक गतिशील प्रक्रिया है।