मोबाइल और वीडियो गेम की तरह अब किशोरों को अपने गुस्से पर काबू पाने के लिए भी पॉज बटन दबाना सिखाया जा रहा है। एंगर मैनेजमेंट ट्रेनिंग में बच्चों को समझाया गया कि गुस्सा आते ही तुरंत प्रतिक्रिया देना आग में घी डालने जैसा होता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे समय में कुछ पल रुकना, खुद को शांत करना और फिर जवाब देना सबसे प्रभावी तरीका है। पीजीआई ने विभिन्न चिकित्सा संस्थानों के साथ मिलकर बच्चों में एंगर मैनेजमेंट को लेकर शोध किया। अध्ययन में सामने आया कि सही समय पर दी गई एंगर मैनेजमेंट ट्रेनिंग किशोरों के आक्रामक व्यवहार को काफी हद तक कम कर सकती है। यह शोध मई 2026 में इंटरनेशनल जर्नल फॉर मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च में प्रकाशित हुआ है।
शोध में बताया गया है कि किशोरावस्था के दौरान शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलाव तेजी से होते हैं। ऐसे में गुस्सा, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार बढ़ना आम बात है। इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया जाए तो हिंसा, अपराध, नशे और मानसिक समस्याओं का कारण बन सकता है। इस रिसर्च में जालंधर के फीनिक्स ग्लोबल इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग की असिस्टेंट प्रोफेसर कंचन, पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग में स्ट्रोक टीम कोऑर्डिनेटर महेंद्र कुमार और शिमला नर्सिंग कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर रितिका सोनी शामिल रहीं। शोध हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित सरकारी स्कूलों के 80 किशोरों पर किया गया।
चौंकाने वाला परिणाम आया सामने
शोधकर्ताओं ने किशोरों के गुस्से और आक्रामक व्यवहार का आकलन करने के लिए मॉडिफाइड बस एंड पेरी एग्रेसन क्वेश्चनेयर का इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्हें 10 दिनों तक एंगर मैनेजमेंट स्किल ट्रेनिंग दी गई। एक सप्ताह बाद दोबारा परीक्षण में सकारात्मक बदलाव सामने आए। अध्ययन के अनुसार ट्रेनिंग से पहले किशोरों का औसत एग्रेसन स्कोर 90.85 था, जो बाद में घटकर 66.06 रह गया। शोधकर्ताओं ने इसे सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण बदलाव बताया। पहले 95 प्रतिशत किशोर मध्यम स्तर की आक्रामकता श्रेणी में थे, लेकिन ट्रेनिंग के बाद 75 प्रतिशत किशोर हल्के स्तर की आक्रामकता में पहुंच गए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि कई किशोर अपना गुस्सा लोगों की बजाय वस्तुओं पर निकालते हैं, जबकि कुछ बहस और झगड़ों में जल्दी उलझ जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा दौर में किशोरों को केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि भावनाओं को नियंत्रित करना भी सिखाना जरूरी है।
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किशोरों को ट्रेनिंग की ज्यादा जरूरत
शोध में कहा गया है कि किशोरों का मस्तिष्क अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे में वे भावनात्मक प्रतिक्रिया जल्दी देते हैं और कई बार बिना सोचे आक्रामक व्यवहार कर बैठते हैं। यही वजह है कि स्कूलों और परिवारों में संवाद, काउंसलिंग और एंगर मैनेजमेंट जैसी ट्रेनिंग की जरूरत बढ़ रही है। अध्ययन के अनुसार एंगर मैनेजमेंट ट्रेनिंग सिर्फ किशोरों के व्यवहार को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है बल्कि इससे उनके रिश्तों, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।
स्कूलों और नर्सिंग संस्थानों ऐसे कार्यक्रम चलाने की सिफारिश
शोधकर्ताओं ने स्कूलों और नर्सिंग संस्थानों में नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रम चलाने की सिफारिश की है ताकि भविष्य में हिंसक और आक्रामक व्यवहार की घटनाओं को कम किया जा सके।
गुस्से पर काबू करने के ये तरीके सिखाए
1. एंगर मैनेजमेंट ट्रेनिंग में किशोरों को सबसे पहले यह समझाया गया कि गुस्सा आना गलत नहीं है लेकिन उसे गलत तरीके से निकालना नुकसानदायक हो सकता है। उन्हें बताया गया कि गुस्सा आने पर शरीर और दिमाग में क्या बदलाव होते हैं और कैसे छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने से झगड़े बढ़ जाते हैं।
2. ट्रेनिंग के दौरान बच्चों को गुस्सा कंट्रोल करने के आसान तरीके सिखाए गए। जैसे-गुस्सा आते ही कुछ देर शांत बैठना, गहरी सांस लेना, तुरंत जवाब न देना और खुद को उस स्थिति से थोड़ी देर के लिए दूर कर लेना। उन्हें यह भी सिखाया गया कि अपनी बात चिल्लाकर या मारपीट से नहीं बल्कि शांत तरीके से कैसे रखी जाए।
3. किशोरों को पॉजिटिव सोच विकसित करने, दूसरों की बात सुनने और छोटी बातों को नजरअंदाज करने की सलाह दी गई। ट्रेनिंग में यह भी बताया गया कि खेल, संगीत, योग, दोस्तों से बातचीत और पसंदीदा गतिविधियां तनाव और गुस्सा कम करने में मदद करती हैं।
4. बच्चों को यह समझाने की कोशिश की गई कि हर समस्या का हल लड़ाई नहीं होता। अगर किसी बात से दुख या गुस्सा हो तो उसे परिवार, शिक्षक या दोस्तों से साझा करना बेहतर तरीका है।
शोधकर्ताओं के अनुसार इन तकनीकों से किशोरों में आक्रामक व्यवहार में कमी आई और वे अपनी भावनाओं को पहले से बेहतर तरीके से संभालने लगे।