पंजाब में पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रदेश सरकार की तरफ से तमाम बड़े दावे किए जाते हैं। पराली जलाने वाले किसानों पर पर्यावरणीय मुआवजा लगाने, उनके रेवेन्यू रिकॉर्ड में रेड एंट्री करने और एफआईआर तक दर्ज करने की बात कही जाती है, लेकिन असलियत में यह कार्रवाई सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह गई है।
जमीनी स्तर पर इस कार्रवाई को अमल में लाने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। अगर वर्ष 2021 से 2023 तक का रिकॉर्ड देखा जाए तो पराली जलाने के 1,57,889 मामले सामने आए हैं, लेकिन सिर्फ 26,947 मामलों में ही हर्जाना ठोका गया है। इस हर्जाने को वसूलने के लिए भी कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
इस अवधि के दौरान सरकार ने 7.16 करोड़ रुपये का हर्जाना लगाया है, लेकिन 1.90 करोड़ ही वसूला गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को जमीनी स्तर पर किसानों को पराली के उचित प्रबंधन के लिए उचित सुविधाएं प्रदान करने के साथ ही सख्ती करने की जरूरत है, तभी जाकर पराली जलाने के मामलों पर नकेल कसी जा सकती है।
इसी तरह अगर एफआईआर दर्ज करने की बात की जाए तो तीन साल में आईपीसी की धारा 188 के तहत सिर्फ 1149 एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिसमें वर्ष 2021 में कोई एफआईआर नहीं हुई। इसी तरह वायु अधिनियम 1981 के तहत 2023 में सिर्फ 44 मामलों में अभियोजन चलाया गया, जबकि वर्ष 2022 व 2021 में इस अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह (सीआरपीसी) की धाराएं 107 और 151 के तहत इकलौता मामला सिर्फ 2023 में दर्ज हुआ।
इसके अलावा 15,672 मामलों में ही खसरा गिरदावरी में रेड एंट्री की गई है, जिसमें पिछले साल पराली जलाने के 36,663 मामले सामने आए थे, लेकिन केवल 24,37 मामलों में ही खसरा गिरदावरी में रेड एंट्री की गई थी।
वर्ष पराली जलाने के मामले हर्जाना (करोड़ों में) वसूली 188 के तहत एफआईआर
2021 72,304 2.85 1.90 लाख कोई नहीं
2022 49,922 1.72 10 हजार 5
2023 36,663 2.57 1.88 करोड़ 1144
पंजाब में पराली के मुद्दे को लेकर किसानों व सरकार के बीच गैप है, जिसे दूर करने की जरूरत है। किसानों को सही रूप से जागरूक करने की आवश्यकता है। सरकार किसानों पर हर्जाना लगा रही है, लेकिन उसकी भरपाई करवाने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा रेवेन्यू रिकॉर्ड में रेड एंट्री व एफआईआर के बाद भी किसान नहीं मान रहे हैं तो इसका मतलब सरकार के प्रयासों में कोई कमी है।
- डॉ. रणजीत सिंह, कृषि विशेषज्ञ एवं रिटायर्ड प्रोफेसर, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला।
किसानों को पराली के इन सीटू प्रबंधन पर ही काम करना चाहिए। खेतों के अंदर ही पराली का प्रबंधन उपजाऊ जमीन के लिए भी लाभदायक है। सरकार की तरफ से इन सीटू प्रबंधन के लिए मशीनें प्रदान की जा रही हैं और दूसरी किसी भी मशीन की पराली प्रबंधन के लिए जरूरत नहीं है। हालांकि इन मशीनों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जाता है, ताकि यह हर किसान की पहुंच में हो।
- अमनप्रीत सिंह बराड़, बोर्ड सदस्य, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना।
पंजाब में पराली प्रबंधन के लिए सरकार बड़े स्तर पर काम कर रही है। प्रदेश में फसल अवशेष को कंप्रेस्ड बायोगैस और बायोमास पैलेट्स में बदलने के लिए योजना तैयार की गई है। 50 प्रतिशत पराली का निस्तारण इस माध्यम से करने का प्रयास है, जिसके लिए जल्द ही नए प्लांट लगाने की तैयारी की जा रही है।
- अमन अरोड़ा, कैबिनेट मंत्री, पंजाब सरकार।