जस्टिस रूपिंदरजीत चाहल की पीठ ने कपूरथला निवासी अवतार सिंह उर्फ काला की अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2004 में फास्ट ट्रैक अदालत के दोषसिद्धि आदेश को निरस्त कर दिया। निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 450 के तहत दोषी ठहराया था।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने करीब 20 साल पुराने दुष्कर्म मामले में आरोपी को बरी करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सात-सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा रद्द कर दी।
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अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित नहीं कर सका कि महिला के साथ बने शारीरिक संबंध उसकी इच्छा के विरुद्ध और बिना सहमति के थे। ऐसे में आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
जस्टिस रूपिंदरजीत चाहल की पीठ ने कपूरथला निवासी अवतार सिंह उर्फ काला की अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2004 में फास्ट ट्रैक अदालत के दोषसिद्धि आदेश को निरस्त कर दिया। निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 450 के तहत दोषी ठहराया था।
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अभियोजन के अनुसार 5-6 फरवरी 2004 की रात आरोपी दीवार फांदकर महिला के घर में घुसा, किरपान दिखाकर धमकाया और दुष्कर्म किया। महिला के शोर मचाने पर उसके सास-ससुर मौके पर पहुंचे और आरोपी फरार हो गया।
सुनवाई के दौरान आरोपी ने शारीरिक संबंध बनने से इनकार नहीं किया लेकिन उन्हें सहमति से बना बताया। हाईकोर्ट ने कहा कि बिना सहमति संबंध साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन की थी। अदालत ने पाया कि महिला द्वारा संघर्ष और किरपान से चोट लगने का दावा मेडिकल रिपोर्ट से पुष्ट नहीं हुआ। ससुर के बयान में भी चोट का जिक्र नहीं था। साथ ही घटना के समय कमरे में बच्चे और पास में सास-ससुर होने के बावजूद तत्काल हस्तक्षेप के ठोस साक्ष्य भी सामने नहीं आए जिससे अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा हुआ।