गुरदासपुर में भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बुधवार को एक आईईडी विस्फोट में सीमा सुरक्षा बल का एक जवान गंभीर रूप से घायल हो गया। यह पहली बार है जब इस सीमा क्षेत्र में इतने खतरनाक विस्फोटक और छर्रों से बने घातक उपकरण का इस्तेमाल किया गया है।
इस गश्त का उद्देश्य जवानों, रक्षा कर्मियों और स्थानीय किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था, जो दिन के समय इस मार्ग का उपयोग करते हैं। जब गश्ती दल इलाके की घेराबंदी और उसे सुरक्षित बनाने का प्रयास कर रहा था, तभी एक आईईडी का छिपा हुआ डेटोनेटर अचानक सक्रिय हो गया, जिससे एक जवान के पैर में गंभीर चोट आई और उसके एक पैर का अंगूठा उड़ गया।
खतरे के बावजूद, जवानों ने अभियान जारी रखा और क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित किया, जिससे एक बड़ी त्रासदी टल गई। शेष आईईडी उपकरणों को सुबह होने पर निष्क्रिय कर दिया गया।
बीएसएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गुरदासपुर क्षेत्र में पहले ड्रोन के जरिए पाकिस्तान से नशीले पदार्थों की तस्करी की घटनाएं सामने आई थीं, लेकिन आईईडी का इस्तेमाल पहली बार हुआ है।
बीएसएफ के पंजाब फ्रंटियर (मुख्यालय जलंधर) से अधिकारी मौके पर पहुंच गए हैं और सुरक्षा की समीक्षा कर रहे हैं। अधिकारी ने कहा कि यह पंजाब सीमा ही नहीं, बल्कि पूरे 2,289 किलोमीटर लंबे अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में पहली बार आईईडी विस्फोट की घटना है।
1965 और 1971 की जंग तथा 2001 के संसद हमले के बाद शुरू किए गए ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के दौरान दोनों देशों की सेनाओं ने ज़मीन में बारूदी सुरंगें बिछाई थीं, जिन्हें बाद में निष्क्रिय किया गया। लेकिन अब तक इस क्षेत्र में आईईडी का उपयोग नहीं किया गया था। बीएसएफ ने कहा है कि इस घटना के बाद सीमा पर गश्त की रणनीति में बदलाव किया जाएगा, जो अभी पैदल और घोड़े की सवारी पर आधारित होती है। स्थानीय पुलिस में भी शिकायत दर्ज करवाई जाएगी।
बीएसएफ ने अपने बयान में कहा कि जवानों द्वारा दिखाया गया साहस न केवल एक बड़ी घटना को टाल गया, बल्कि अनगिनत नागरिकों की जान भी बचाई। आईईडी विस्फोट अन्य संघर्ष क्षेत्रों जैसे माओवादी प्रभावित क्षेत्रों, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में सुरक्षा बलों और नागरिकों के लिए बड़ा खतरा बनते रहे हैं, और मेट्रो शहरों में भी आतंकियों द्वारा ऐसे विस्फोटों में अनेक निर्दोष लोग अपनी जान और अंग गंवा चुके हैं।