शहीद की अंतिम यात्रा में शामिल विधायक धालीवाल।
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पंजाब के अमृतसर के रहने वाले नायब सूबेदार परगट सिंह का पार्थिव शरीर उनके पैतृक कस्बे रामदास, विधानसभा क्षेत्र अजनाला, पहुंचते ही पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर जैसे ही गांव पहुंचा, हजारों लोगों ने नम आंखों से अंतिम दर्शन किए। इस दौरान भारत माता की जय और शहीद परगट सिंह अमर रहें के नारों से माहौल गूंज उठा। सैन्य सम्मान के साथ शहीद का अंतिम संस्कार किया गया।
स्थानीय लोगों, पूर्व सैनिकों, सामाजिक संगठनों और युवाओं ने बढ़-चढ़कर शिरकत की और शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। हर आंख नम थी, लेकिन चेहरे पर देश के लिए बलिदान देने का गर्व साफ झलक रहा था। शहीद परगट सिंह ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसे क्षेत्रवासी कभी नहीं भूलेंगे। जम्मू कश्मीर में ड्यूटी करते शहीद हुए अमृतसर के जवान परगट सिंह की अर्थी को विधायक कुलदीप धालीवाल ने कंधा देकर श्रद्धांजलि दी व परिवारजनों के साथ सहानुभूति प्रगट की
इस मौके पर पूर्व कैबिनेट मंत्री कुलदीप धालीवाल, प्रशासन और सेना के अधिकारियों ने भी श्रद्धासुमन अर्पित कर परिजनों को ढांढस बंधाया। शहीद की शहादत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
अनंतनाग में थी तैनाती, 19 राष्ट्रीय राइफल्स में थे तैनात
सेना के अनुसार नायब सूबेदार प्रगट सिंह भारतीय सेना की 19 राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट में सेवाएं दे रहे थे। वर्तमान में उनकी पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में थी। वे पिछले करीब नौ वर्षों से लगातार संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण इलाकों में तैनात रहकर देश की सुरक्षा में योगदान दे रहे थे।
ऑक्सीजन की कमी से आया हार्ट अटैक
परिवार को सेना की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, प्रगट सिंह की मौत ऑक्सीजन की कमी के चलते हार्ट अटैक से हुई। शहादत से एक दिन पहले देर शाम उन्होंने परिवार से फोन पर बातचीत की थी। बातचीत के दौरान उन्होंने सांस फूलने की शिकायत की थी और ज्यादा देर तक बात नहीं कर पाए थे। परिवार ने उन्हें डॉक्टर को दिखाने और आराम करने की सलाह दी थी, लेकिन अगले दिन शहादत की खबर ने पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया।
2015 में सेना में भर्ती, डेढ़ माह पहले ही छुट्टी से लौटे थे
नायब सूबेदार प्रगट सिंह 23 दिसंबर 2015 को भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। वे लगभग 11 वर्षों से सेना में सेवा दे रहे थे। करीब डेढ़ माह पहले ही वे छुट्टी काटकर अपने गांव आए थे और कुछ सप्ताह पहले ही ड्यूटी पर वापस लौटे थे।