किसानों पर किए लाठीचार्ज में खुद को बेकसूर और मजबूर बताते हुए पुलिस ने सारा दोष किसानों पर डाल दिया। पुलिस के मुताबिक उन पर पत्थरबाजी कर जानलेवा हमला होने के बाद ही उन्होंने किसानों पर लाठियां चलाई।
वहीं रात को मारे गए किसान बहादुर सिंह निवासी गांव बंडाला की मौत को नेचुरल करार कर दिया है। शनिवार को इस संबंध में पुलिस कमिश्नर जतिंदर सिंह औलख ने प्रेसवार्ता में प्रदर्शनकारी किसानों पर किए लाठीचार्ज पर अपनी सफाई दी।
औलख ने कहा कि किसानों ने चीफ इंजीनियर के कार्यालय में काम करती महिला कर्मचारियों को अंदर ही बंद कर दिया था। उन्हें साढे़ पांच बजे के करीब बाहर आने दिया गया। इसी तरह एक्सईएन सोमनाथ माही को भी नजरबंद कर लिया। जिसे सात बजे के बाद रिहा किया गया।
किसानों ने उन पर पत्थरबाजी की, इसमें उनके दो एडीसीपी और 15 अन्य मुलाजिम जख्मी हो गए है। इसके जवाब में उन्होंने लाठीचार्ज के आदेश दिए। इसके अलावा जिस किसान की मौत हुई है। उसके शरीर पर कोई भी चोट का निशान नहीं है। किसान की मौत उनकी लाठियों से नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि भगदड़ के दौरान करीब 43 किसानों को गिरफ्तार किया गया है और उनके खिलाफ एफआईआर लांच की जा रही है।
बिजली विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों ने स्वयं इस बात को स्वीकार कर लिया कि महिलाओं को साढे़ पांच बजे और एक्सईएन को सात बजे के बाद रिहा कर दिया था। इसके बाद भी पुलिस ने करीब आठ बजे लाठीचार्ज शुरू किया और देर रात दस बजे तक यह सिलसिला जारी रहा है।
पुलिस यही तर्क देने में लगी है कि बंधक बनाए अधिकारियों को छुड़वाना जरूरी था। जब सभी लोग सात बजे तक बाहर आ चुके थे, तो इसके बाद भी किसानों को वहां से निकलने का रास्ता नहीं दिया गया। उन्होंने चारों ओर से पुलिस ने घेरा डाला हुआ था। इस बारे में जब पुलिस कमिश्नर से पूछा तो उन्होंने कहा कि आत्मरक्षा में लाठीचार्ज किया गया। प्रदर्शनकारियों को पानी की बौछार के साथ भी हटाया जा सकता था। लेकिन पुलिस के पास जितने भी केनन मौजूद है, वह सब जगराओं में होने वाली नरेंद्र मोदी की रैली के लिए भेजे है। जबकि शहरी पुलिस के पास आपात स्थिति में निपटने के लिए अब पानी के केनन भी नहीं है।