1965 के शहीद अशोक चक्र विजेता के परिवार के जख्म हरे
गुरदासपुर।
वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध को 52 वर्ष पूरे होने को है। गत वर्ष सरकार ने इस युद्ध की जीत को स्वर्ण जयंती के रूप में मनाते हुए शहीद सैनिकों की शहादत को एक सुर में याद कर उनके शौर्य को सारे देश ने नमन किया था। वहीं उस युद्ध की विभीषिका का दंश झेलने वाले शहीद परिवारों के जख्म आज भी हरे है। ऐसा ही एक परिवार है सीमावर्ती गांव हैबत पिंडी निवासी रेलवे के फायरमैन अशोक चक्र विजेता शहीद चमन लाल का, जो कि शहादत के पांच दशक बीत जाने के बावजूद भी सरकार की उपेक्षा का दंश झेल रहा है। शहीद फायरमैन चमन लाल ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में अपनी वीरता दिखाते हुए पूरे गुरदासपुर शहर को तबाह होने से बचाया था।
पिछले 50 वर्षो से अपने मायके अमृतसर में रह शहीद की पत्नी आशा रानी ने गुरदासपुर प्रवास के दौरान नम आंखों से बताया कि 13 सितंबर का दिन वह भला कैसे भूल सकती हैं। उनके पति उस समय गुरदासपुर रेलवे स्टेशन पर फायरमैन के पद पर तैनात थे। भारत-पाक के बीच जंग चल रही थी। स्टेशन पर पेट्रोल टैंकरों से भरी मालगाड़ी आकर रुकी थी कि उसी समय पाकिस्तानी जहाजों ने स्टेशन पर भीषण गोलाबारी शुरू कर दी। इससे तीन टैंकरों में आग लग गई। फायरमैन चमन लाल ने जान की परवाह किए बिना आग की चपेट में आए डिब्बो को बाकी ट्रेन से अलग कर सुरक्षित जगह पर पहुंचाया। इस दौरान वह खुद आग में घिरकर शहादत का जाम पी गए। उनके इस अदम्य साहस के लिए 26 जनवरी 1966 को तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राधा कृष्णन ने उनको मरणोपरांत अशोक चक्र प्रथम श्रेणी से सम्मानित किया। शहीद के परिवार से दुख सांझा करने पहुंचे शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविंदर विक्की ने कहा कि सरकार को शहीद परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए अपने वायदे को पूरा करना चाहिए। उन्होंने बताया कि शहीद चमन लाल की शहादत को नमन करने के लिए 13 सितंबर को सुबह रेलवे स्टेशन गुरदासपुर और दोपहर बाद गांव हैबतपिंडी के सरकारी हाई स्कूल में श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया जा रहा है।
बेटा बेरोजगार, पेंशन से परिवार का गुजारा
शहीद की पत्नी ने बताया कि पति की शहादत के समय बेटा राज कुमार मात्र 40 दिन का था व बेटी पवना कुमारी 2 वर्ष की थी। पति की शहादत के बाद सरकार ने उनके गांव में एक यादगिरी गेट का निर्माण, सरकारी स्कूल, डिस्पेंसरी का नाम शहीद के नाम पर कराने, गांव में एक स्टेडियम बनाने की घोषणा की थी। पति के शहादत के 52 वर्ष गुजर जाने के बाद भी घोषणाओं को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। कुछ वर्ष पहले उन्होंने अपने खर्चे पर ही अपने गांव में यादगिरी गेट का निर्माण करवाया ताकि सीमावर्ती क्षेत्र की युवा पीढ़ी उनके पति की शहादत से प्रेरणा ले सकें। उन्होंने बताया कि पति के शहीद होने के बाद रेलवे ने उन्हें नौकरी दी और गुरदासपुर रेलवे स्टेशन पर पति की याद में एक स्मारक भी बनवाया। रेलवे में निशुल्क पास की सुविधा काफी जद्दोजहद के बाद वर्ष 2012 में ही मिली। उन्होंने बताया कि अब वह सेवा निवृत्त हो चुकी हैं। बेटा आज भी बेरोजगार घूम रहा है। सरकार से मिलने वाली पेंशन से ही परिवार का गुजारा चल रहा है।