‘मिर्चपुर के दलित अमानवीय जिंदगी जी रहे हैं। हिसार स्थित फार्म हाउस में रह रहे दलित परिवार असुरक्षित, बदतर हालात में हैं। कोई भी दलित परिवार मिर्चपुर लौटना नहीं चाहता। महिलाओं को दबंग जाति के लोग ताने कसते हैं।
उनके बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं दिया जा रहा। गांव में जले और टूटे घरों को हालांकि दोबारा से तैयार किया गया है मगर अधिकतर खाली पड़े हैं।’ ये तथ्य सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई संयुक्त जांच रिपोर्ट में सामने आए हैं।
टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस मुंबई के प्रतिनिधि सहायक प्रोफेसर शमीम मोदी और हिसार जिला विधिक सेवाएं प्राधिकरण के अध्यक्ष व जिला एवं सत्र न्यायाधीश एके जैन द्वारा तैयार की गई यह रपट सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को दो दिन कार्रवाई के लिए भेजी थी। हालांकि रिपोर्ट पर प्रदेश सरकार ने असहमति जताई है।
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में शुक्रवार को सुनवाई करेगा। प्रदेश सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को नियुक्त किया है।
ये हैं रिपोर्ट के खास बिंदु
1. मिर्चपुर में वाल्मीकि समुदाय के घर खाली थे। नए मकान भी खाली हैं। वाल्मीकि चौपाल में गांव और पड़ोसी गांव से जो दलित पहुंचे थे, उन्होंने गांव में रहने से साफ मना कर दिया। उन्हें डर है कि अगर वे गांव लौटे तो उनकी जिंदगी, स्वतंत्रता और गरिमा दबंग समुदाय के हाथों खतरे में पड़ जाएगी।
2. हिसार स्थित एग्रीकल्चर फार्म हाउस में अधिकतर दलित परिवार रह रहे हैं। मगर ये पीड़ित अमानवीय, असुरक्षित, मैली स्थितियों में जी रहे हैं। कई-कई लोग एक ही तंबू का प्रयोग कर रहे हैं। महिलाओं समेत सभी दलितों ने गांव में जाने के विचार का विरोध किया। महिलाओं ने कहा कि दबंग समुदाय के पुरुष उन पर अपमानजनक टिप्पणियां कसते हैं।
3. दलितों के बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं दिया गया। रोजगार नहीं दिया गया।
रिपोर्ट में ये दिए हैं सुझाव
1. मिर्चपुर के पीड़ितों को अगर गांव भेजा गया तो यह बेहद अन्याय होगा। अगर उन्हें लौटने का आदेश दिया जाता है तो फिर अमानवीय व्यवहार उनके साथ हो सकता है।
2. पीड़ितों को सामूहिक तौर पर मिर्चपुर के बाहर कहीं बसाया जाए। सरकार उनके घर बनाने में मदद करे। वहां सुविधाएं हों। व्यापार के अवसर हों। आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र, पुलिस चौकी के साथ पूरी सुरक्षा हो। जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक उनकी सुरक्षा स्वयं देखें।
3. पीड़ितों के बच्चों का स्कूलों में दाखिला कराया जाए। जिला कलेक्टर की देखरेख में दाखिला सुनिश्चित किया जाए।
4. पीड़ितों के राशन कार्ड, बीपीएल कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, वोटर कार्ड बनाए जाएं।
5. सामाजिक आघात से उबरने के लिए मनोवैज्ञानिक उपलब्ध कराए जाएं।