अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 55 साल के बाद उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर 1970 के दशक में पूर्व राष्ट्रपति निक्सन चले। विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रंप निक्सन की डॉक्टरिन से भी आगे बढ़कर सोच रहे हैं। ट्रंप का एक लक्ष्य रूस को चीन के सब्सिडियरी देश की श्रेणी से बाहर लाना हो सकता है। भारत भी अमेरिका को साधने के लिए हर स्तर की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया के देशों की बांह मरोड़ने में लगे हैं। उनके पास तीन बड़ा एजेंडा है। पहला, जैसे को तैसा (Reciprocal) टैरिफ। दूसरा, दुनिया में युद्धबंदी और तीसरा एजेंडा यूरोप को पीछे छोड़कर रूस के साथ सकारात्मक रिश्ता रख उसे चीन का सब्सिडियरी स्टेट न बनने देना। क्या अमेरिका के राष्ट्रपति ऐसा करके दुनिया और अमेरिका का हीरो बन पाएंगे? बड़ा सवाल यह भी कि भारत के लिए कैसा रहेगा ?
क्या है रूस को चीन के सब्सिडियरी देश से बाहर निकालना?
पूर्व विदेश सचिव शशांक राष्ट्रपति ट्रंप के अपने अभियान में सफल हो जाने भविष्यवाणी कर रहे हैं। अमर उजाला से विशेष बातचीत में शशांक कहते हैं कि ट्रंप होशियारी से और होमवर्क के साथ आगे बढ़ रहे हैं। वह 1970 के दशक में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति निक्सन की डॉक्टरिन से आगे बढ़कर सोच रहे हैं। निक्सन ने जिस तरह से चीन को उच्च तकनीकी देकर उसके उभार का रास्ता खोल दिया था।शशांक कहते हैं कि ट्रंप की नीति में मुझे उससे थोड़ा आगे की झलक दिखाई दे रही है। उनका एक लक्ष्य रूस को चीन के सब्सिडियरी देश की श्रेणी से बाहर निकालने का हो सकता है। ट्रंप घरेलू और आंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर बड़ी सावधानी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिका के हर साल अरबों डॉलर को मदद के तौर पर जाते थे, उसे बचा रहे हैं। मुझे लग रहा है कि वह दूसरे कार्यकाल के 4 साल में अमेरिका के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवधारणा में बड़ा बदलाव लाएंगे। पूर्व विदेश सचिव की इस राय से विदेश मामलों के कई विशेषज्ञ इत्तेफाक रखते हैं।
चीन के सब्सिडियरी देश से रूस को बाहर निकालने का अर्थ रूस की चीन पर निभर्रता को कम करना है। यह निर्भरता पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। सामरिक मामलों के जानकार पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि चीन और रूस का आपसी तालमेल बढ़ रहा है। यह दीर्घकाल के लिए अमेरिका के लिए अच्छा नहीं है। ट्रंप के कूटनीतिकार चाहते होंगे कि रूस आत्म निर्भरता की तरफ बढ़े। क्योंकि फायर पॉवर से लेकर अन्य मामलों में रूस अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा में काफी पिछड़ चुका है। जबकि चीन अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा की दौड़ में दूसरे नंबर पर है।
विज्ञापन
2 of 3
डोनाल्ड ट्रंप के साथ पीएम मोदी
- फोटो : पीटीआई
भारत के लिए सुनहरा अवसर है, शेष समय की बात
शशांक कहते हैं कि भारत इस अवसर को कूटनीतिक तरीके से भुना सकता है। वह कहते हैं कि इसकी कोशिशें चल भी रही होंगी। विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार का भी कहना है कि भारत अमेरिका को साधने के लिए हर स्तर की कोशिश कर रहा है। समझा जा रहा है कि रायसीना डॉयलाग से लेकर माह के अंततक प्रस्तावित दौरे में काफी बड़ी कोशिश होगी। विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एसके शर्मा का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप के कामकाज को लेकर भले लोगों में बड़ी अनिश्चितता हो, लेकिन ट्रंप की टीम में इसे लेकर कोई भ्रम नहीं है। ट्रंप ने अभी यूरोप और नाटो संगठन को किनारे कर रखा है। कनाडा, मैक्सिको को लेकर उनका रुख सामने है। वह अभी मध्यपूर्व एशिया को लेकर संभलकर पत्ते खोल रहे हैं। एसके शर्मा पूर्व विदेश सचिव शशांक से सहमति जताते हुए कहते हैं कि अमेरिका की मंशा चीन से टकराने की नहीं दिखाई देती, लेकिन उसे एशिया का बाजार और एशिया में अपना प्रभाव चाहिए। अमेरिका की इस मंशा में भारत से बड़ी साझेदारी भला और कौन कर सकता है। भारत के रणनीतिकार इस गंभीरता को समझते हैं। भारत की मंशा भी चीन से टकराव की नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित में उच्च तकनीकी सहयोग और साझेदारी को बढ़ाने की है। मुझे लग रहा है कि हमारे रणनीतिकार अमेरिका से सही समीकरण बनाकर प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं।
अभी थोड़ा इंतजार करना चाहिए
विदेश मामले के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं, कि अभी ट्रंप को लेकर कोई भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है। रंजीत कुमार की भाषा में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का टेस्ट मिलता है। हालांकि रंजीत कुमार इससे इत्तेफाक रखते हैं कि ट्रंप ने यूरोप को किनारे बैठा दिया है। नाटो संगठन के भविष्य पर बादल घूमने लगे हैं। कुमार का कहना है कि ट्रंप अभी टैरिफ वार को सामने रखकर दुनिया के देशों का रक्तचाप बढ़ा रहे हैं। ट्रंप को कनाडा, चीन समेत तमाम देश अपने यहां अमेरिकी उत्पाद पर टैरिफ बढ़ाने का निर्णय लेकर इसका जवाब दे रहे हैं। इसलिए अभी जल्दबाजी में नतीजे पर पहुंचने का समय नहीं है।
अमेरिका के टैरिफ वॉर का मतलब क्या है?
सुधीर मिश्रा अमेरिका और भारत के संबंधों पर काम कर रहे हैं। वह अमेरिका के टैरिफ वॉर को एक अलग नजरिए से देख रहे हैं। सुधीर कहते हैं कि अभी तक अमेरिका दुनिया के देशों में अपनी तकनीक, उत्पाद आदि के लिए बाजार तैयार करने की कोशिश कर रहा था। उसे इसको बेचने की फिक्र थी। उदारता लचीला रूख को आगे रखकर चल रहा था। अब पहली बार उसकी मंशा सामान को बेचने के साथ-साथ जैसे को तैसा टैरिफ के रूप में वसूली की भी है। सुधीर कहते हैं कि ताजा उथल-पुथल उसकी इसी मंशा को लेकर है। इससे अमेरिकी बाजार में भी बड़ी उथल पुथल है। तमाम बड़े अर्थशास्त्री इसको लेकर आर्थिक मंदी तक की भविष्यवाणी कर रहे हैं। लेकिन ट्रंप खुद कह रहे हैं कि उन्होंने जीवन में बड़ी सौदेबाजी की है। सुधीर कहते हैं कि इसे अभी ट्रंप की सौदेबाजी मान लीजिए। सौदेबाजी करने वाली प्रक्रिया हमेशा हानि और लाभ को ध्यान में रखकर होती है।