तुर्की में तख्तापलट करने के सेना के प्रयासों को आम जनता और पुलिस ने शनिवार को नाकाम कर दिया। हालांकि सरकार और सेना के बीच भिड़ंत में 250 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, जबकि तीन हजार से ज्यादा बागी सैनिक गिरफ्तार किए गए हैं। तख्तापलट का समर्थन कर रहे करीब 100 सैनिकों ने इस्तांबुल में बोसफोरस पुल पर आत्मसमर्पण कर दिया। यह पुल सारी रात इन सैनिकों के कब्जे में रहा था।
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तुर्की में तख्तापलट की कोशिशों के बीच मचा कोलाहल, सड़कें बनीं युद्ध का मैदान, तस्वीरें
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तुर्की में तख्तापलट की कोशिशों में शामिल करीब 50 जवानों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। इन लोगों ने इस्तांबुल स्थित बॉसपोरस पुल पर कब्जा जमा रखा था। मुल्क के सरकारी टीवी में ये लोग सिर पर हाथों को सर रखकर आत्मसमर्पण करते दिखे। राजधानी अंकारा में रात भर जारी रही झड़पों में 250 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में ज्यादातर आम नागिरक हैं। वहीं, 2839 लोग गिरफ्तार बताए जा रहे हैं।
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इस बीच तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तइप एर्दोगन ने स्थिति को सरकार के नियंत्रण में बताते हुए कहा कि इस रक्तपात का बदला लिया जाएगा और दोषी सैनिकों को कड़ी सजा मिलेगी। देश के मुख्य विपक्षी दलों ने भी सरकार को उखाड़ फेंकने की इस कोशिश की कड़ी निंदा की है। गौरतलब है कि शुक्रवार रात आर्मी के विमान और टैंकर राजधानी अंकारा और इस्तांबुल में गरजने लगे थे।
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रातभर चले खूनीखेल में सेना, पुलिस और आम लोगों समेत सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। संसद के बाहर और राष्ट्रपति के घर के पास बम बरसाए गए। सेना के नवनियुक्त प्रमुख जनरल उमित दुंदार ने बताया कि बगावत में में वायुसेना, सैन्य पुलिस और आर्मी के अधिकारी मुख्य रूप से शामिल हैं। यह भी जोड़ा कि तख्तापलट के इस प्रयास को सेना के किसी भी उच्चपदस्थ अधिकारी का समर्थन हासिल नहीं था।
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इसके पहले तख्तापलट की भनक लगने पर राष्ट्रपति एर्दोगन ने वीडियो संदेश में कहा था, ‘मैं देश की जनता से सड़कों पर उतरने का आह्वान कर रहा हूं। आओ, इन्हें सबक सीखाएं। मुझे नहीं लगता कि तख्तापलट की यह कोशिश सफल होगी। इतिहास में तख्तापलट की कोई भी साजिश सफल नहीं हुई है।’
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बगावत की वजह
तख्तापलट की वजह को राष्ट्रपति एर्दोगन की कट्टरपंथी सोच और तानाशाही रवैये से जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर भी बंदिशें लगा दीं। यही नहीं, सत्ता में आने के बाद राष्ट्रपति ने कई सैन्य अफसरों पर मुकदमे चलवाए।
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इसके अलावा उनकी एके पार्टी के नेतृत्व में देश का इस्लाम की तरफ झुकाव भी बढ़ा। 2002 में तुर्की के मदरसों में तालीम लेने वाले छात्रों की संख्या 65 हजार थी, जो अब करीब 10 लाख है।
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राष्ट्रपति की तानाशाहों जैसी कार्यशैली के कारण जहां सेना में असंतोष बढ़ रहा था, वहीं सरकारी नीतियों के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष नेताओं का विरोध भी बढ़ता जा रहा था। राष्ट्रपति के विपरीत सेना धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और तुर्की को यूरोप की सदस्यता दिलाने की समर्थक है। लिहाजा बढ़ते टकराव के कारण तुर्की की सेना बगावत पर उतर आई।
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तख्तापलट की पीछे कौन
तख्तापलट की कोशिश के पीछे मुस्लिम धर्मगुरु फेतुल्लाह गुलेन का नाम लिया जा रहा है। तुर्की सरकार के वकील रॉबर्ट एम्सटर्डम ने इस घटना से गुलेन का सीधा संबंध बताया है। उस पर सेना के अफसरों को भड़काने का आरोप है। आरोप है कि उसने अमेरिका में ही रहकर तुर्की में तख्तापलट के लिए सेना के कुछ अफसराें को भड़काया।
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गुलेन पहले तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन के करीबी हुआ करते थे। उन्हें 50 साल पहले इस्लाम को गलत तौर पर प्रचारित करने को लेकर नोटिस दिया गया था। बाद में तुर्की के खिलाफ काम करने का आरोप लगा। इसके बाद 90 के दशक से गुलेन अमेरिकी स्टेट पेन्सिलवेनिया में हैं।
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भारत ने जारी किया हेल्पलाइन नंबर
तुर्की में उठापटक के मद्देनजर भारतीय विदेश मंत्रालय ने वहां रह रहे भारतीयों से हालात सुधरने तक घर से बाहर नहीं निकलने की अपील की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट के जरिए यह जानकारी दी। तुर्की में फंसे भारतीय और उनके परिवार इन पर संपर्क कर सकते हैं। तुर्की में करीब 300 भारतीय हैं जिनमें से ज्यादातर डॉक्टर और इंजीनियर हैं।
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50 साल में चार बार बगावत
करीब 8.12 करोड़ आबादी वाले तुर्की में पिछले 50 साल में चार बार तख्तापलट की कोशिशें की गईं। 27 मई, 1960 को सरकार ने सेना के बनाए सख्त नियम दरकिनार कर दिए। तब सेना प्रमुख कमाल गुर्शेल ने तख्तापलट कर दिया। 1966 तक देश में आर्मी का शासन रहा।
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12 मार्च,1970 को देश के आर्थिक स्थिति डांवडोल हो गई तो सेनाध्यक्ष जनरल ममदुल तगमाक ने प्रधानमंत्री सुलेमान दिमेरल को ऑर्डर देना शुरू कर दिया। दिमेरल ने इस्तीफा दे दिया। सेना ने सत्ता हाथ में नहीं ली, लेकिन 1973 तक सरकार पर नजर रखती रही। इसके बाद भी देश के हालात ठीक नहीं हुए तो 12 सितंबर, 1980 को सेना ने सभी काम अपने हाथ में ले लिए।
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आखिरकार 12 सितंबर 1980 को देश में पूरी तरह तख्तापलट कर दिया गया। 1982 में जनमत संग्रह के बाद देश में नया संविधान बना। 27 फरवरी, 1997 में देश की राजनीति में इस्लामी सोच हावी होने का आरोप लगाकर सेना ने राष्ट्रपति सुलेमान दिमिरल को हटवा दिया, लेकिन सत्ता अपने हाथ में नहीं ली।
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एड्रोगन का सियासी सफर
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तइप एर्दोगन तुर्की के पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्हें तुर्की की जनता ने 2014 में सीधे चुना। राष्ट्रपति बनने के पहले वह तुर्की के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। वह तुर्की के इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें लगातार तीन कार्यकाल तक सत्ता मिली है।
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दरअसल राष्ट्रपति रेसेप तइप एर्दोगन की एके पार्टी 2002 में सत्ता में आई। इसके बाद राष्ट्रपति खुद के अधिकार में बढ़ोतरी करने लगे। उन्हें मुसलमान समुदाय में व्यापक समर्थन प्राप्त है। वह अपने विरोधियों को ताकत के बल पर खामोश करने के लिए जाने जाते हैं।
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उनके आलोचक तुर्की के पत्रकारों के ख़िलाफ जांच होती है, उनके खिलाफ मुकदमे चलाए जाते हैं जबकि विदेशी पत्रकारों का उत्पीड़न होता है। विदेशी पत्रकारों को तुर्की से निकाल दिया जाता है। फिलहाल 61 साल के हो चुके एड्रोगन को पहली बड़ी कामयाबी 1994 में मिली जब वह इस्तांबुल के मेयर चुने गए।