मोटरसाइकिल पर सवार, पुरुषों के कपड़े पहने और सिर पर दुपट्टा ओढ़े, ये किसी फ़िल्म का सीन नहीं है, ना ही ये महिला किसी यूरोपीय देश की हैं। ये जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि ये महिला अफ़ग़ानिस्तान के एक गांव की मुखिया हैं। ज़रीफ़ा क़ाज़ीज़ादा अफ़ग़ानिस्तान के नौ अबाद गांव की मुखिया हैं। ज़रीफ़ा, पुरुषों के भेष में रात को सड़कों पर मोटरसाइकिल पर सवार होकर पैट्रोलिंग करती हैं। अपनी असलियत छुपाने के लिए नक़ली मूछें भी लगाती हैं। 2007 का चुनाव हारने के बावजूद वो कहती हैं कि भीषण गर्मी में भी भारी संख्या में गांववाले मीलों तक चलकर पोलिंग बूथ आए थे उनके लिए वोट करने।
मैंने भी बदले में अपने भाइयों के लिए कुछ करने की ठान ली थी। मैंने कहा कि मैं वादा करती हूं कि मैं अपने गांव के लिए बिजली लाऊंगी। सभी हंसने लगे, कहा कि तुम ऐसा कैसे कर सकती हो, तुम तो एक महिला हो। तुम्हारे लिए ये करना असंभव है और वो हंसते रहे। लेकिन उनमें से एक ने कहा कि अगर तुम बिजली लाने में कामयाब हो गई तो मैं तुम्हें ईनाम दूंगा। हालांकि ईनाम क्या होगा ये नहीं कहा। फिर मैंने फ़ैसला किया कि मैं काबुल जाकर खुद ऊर्जा मंत्री से बात करूंगी। मैं अपने साथ अपनी चार साल की बेटी को भी ले गई थी। शहर में पहुंचने के एक घंटे के अंदर ही मैंने मंत्री जी से संपर्क साध लिया और उन्होंने मुझे अगले दिन अपने दफ़्तर बुलाया। हमारी मुलाकात के दौरान पहली बात उन्होंने जो मुझसे कही कि एक महिला होकर इस तरह से उनसे मिलने आना बहुत बहादुरी का काम है। उन्होंने कहा, "चाहे तुम टाइगर हो या टाइग्रेस, लेकिन मैं देख पा रहा हूं कि तुम अपने समुदाय के लिए एक चैंपियन हो।" मीटिंग के अंत में उन्होंने उस आवेदन पत्र पर दस्तख़त कर दिए जिससे बिजली सप्लाई के साथ हमारे गांव को जोड़ने की इजाज़त मिल गई। मैंने वापिस जाकर अपने गांववालों को जब ये बात बताई तो वो बहुत खुश हो गए।
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मुझे इसके बदले कोई ईनाम नहीं मिला
- फोटो : BBC
मुझे इसके बदले कोई ईनाम नहीं मिला। मैंने उम्मीद की थी कि काबुल जाने-आने का खर्चा मुझे मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे अपने गहने बेचकर आने-जाने का खर्च उठाना पड़ा। जब मैं बिजली विभाग के दफ़्तर पहुंची तो उन लोगों ने मुझे बताया कि गांव को ही लैम्पपोस्ट, केबिल और तार देने होंगे। इन सब चीज़ों के लिए पैसों का जुगाड़ करने के लिए मुझे छह अलग संस्थानों से पैसे उधार लेने पड़े और अपने घर को भी दोबारा गिरवी रखना पड़ा। गांव के हर घर में बिजली पहुंचने में पांच महीने लगे। उसके बाद ही लोगों को ऐहसास हुआ कि मैंने उनके लिए क्या किया है। वो इसके बदले में मुझे पैसे देने लगे जिसे मैंने निवेश किया। इससे जो मुनाफ़ा हुआ उससे 50 हज़ार अफ़ग़ानी यानी एक हज़ार डॉलर से मैंने नदी पर ब्रिज बनवाया। अब बाहरी दुनिया से ये गांव अच्छी तरह से जुड़ गया था। पहले लोग अपनी जान जोखिम में रखकर इस नदी को पार करते थे। जब लोग मुझे इन प्रोजेक्ट्स पर काम करते देखते थे तो वो कहते थे कि ये महिला बहुत मेहनत कर रही है और हमें भी ऐसा ही करना चाहिए।
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फिर इन लोगों ने एक वादा किया कि मैं जो कुछ भी कर रही हूं
- फोटो : BBC
फिर इन लोगों ने एक वादा किया कि मैं जो कुछ भी कर रही हूं वो इसमें मेरा समर्थन करेंगे। इसके लिए उन्होंने मुझे गांव की मुखिया के लिए चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया। शुरू में उन्हें लगा कि मैं बिना उनकी मदद के ये काम ठीक तरीके से नहीं कर पाऊंगी। लेकिन मैंने उनसे हमेशा कहा कि अल्लाह ने मुझे एक बहुत बड़ा दिल दिया है सबकी मदद करने के लिए। मैं सो नहीं सकती क्योंकि मेरा दिल कह रहा है कि मुझे बिस्तर से उठकर लोगों की मदद करनी चाहिए। मैंने गांव के मर्दों से कहा कि मुझे एक भी पैसा मत देना। मुझे केवल आप लोगों की दुआओं की ज़रूरत है। आप लोगों को जब भी कोई दिक्कत होगी तो मैं आप लोगों की तरफ से सरकार से बात करूंगी। अगर रात को कोई गड़बड़ी हो तो मैं अपनी बंदूक उठाकर आपके घर आऊंगी और देखूंगी कि क्या परेशानी है और प्रशासन को इसकी जानकारी दूंगी।
मेरे अपहरण की साज़िश रची गई थी। गांव की मुखिया के तौर पर मेरी लोकप्रियता को देखते हुए कोई मुझसे ईर्ष्या करने लगा था। एक दिन जब मैं गांव के दो लोगों के साथ उससे मिलने गई तो मैंने महसूस किया कि मैं ख़तरे में हूं। उसने बंदूक निकाली और अपने घर के ऊपरी माले से मेरे ऊपर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। मैंने उनसे गोली नहीं चलाने की मिन्नत की। मैंने कहा, मुझपर गोलियां मत चलाओ। मुझे अपने जान की परवाह नहीं है। लेकिन ये लोग जो मेरे साथ हैं इनके छोटे-छोटे बच्चे हैं। मेरे साथ आए लोग मुझे बचाने के लिए मेरे सामने खड़े हो गए। फिर ये लोग किसी तरह पुलिस को बुलाने में सफल रहे। पुलिस उसे गिरफ़्तार कर ले गई।
रात को पैट्रोलिंग के दौरान में मर्दों की तरह कपड़े पहनती हूं
- फोटो : BBC
मेरे सात बेटे और आठ बेटियां हैं जिसमें दो जुड़वां जोड़े भी हैं। मेरे 10 बच्चे शादी-शुदा हैं और मेरे 36 नाती-पोते हैं। बहुत सारी दिक्कतें थीं, लेकिन वो सारे बहुत सभ्य निकले। लोग इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि कैसे मैंने अकेले इनकी परवरिश की। वो कहते हैं कि काश उनके बच्चे भी मेरे बच्चों की तरह होते। मुझे हमेशा अपनी ताकत दिखानी पड़ी। अगर मैं ऐसा नहीं करती तो वो मेरी इज्ज़त नहीं करते और मेरा इलाका शांतिपूर्ण नहीं होता। जिला अधिकारियों से कई बार मुझे कॉल आए कि मैं सभी के लिए एक मिसाल हूं। वो कहते हैं कि उन्हें अब इतना सुरक्षित महसूस होता है कि वो रात के वक्त भी अपने घरों के दरवाज़ों को खुला रखते हैं।
हमारे गांव के मस्जिद के सामने एक बड़ा गड्ढा था जिसे मैं मिट्टी से भर रही थी। काम मुश्किल था और मुझे मदद की ज़रूरत थी। इसलिए मैं बगल के गांव से एक ट्रैक्टर लाने गई। जब मैं उसे चलाकर लौट रही थी तो मैंने देखा कि एक जीप रास्ते के किनारे एक गड्ढे में फंस गई है। मैंने देखा कि कुछ लोग एक रस्सी के सहारे उसे निकालने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिल पा रही थी।
मैंने उनसे कहा कि मैं उनकी मदद करती हूं। वो मान गए और दूर खड़े होकर देखने लगे। मैंने रस्सी को ट्रैक्टर से बांधा और जीप को बाहर खींच निकाला। मेरे चारों तरफ भीड़ इकट्ठा हो गई थी। जीप ड्राइवर ने मुझे ईनाम के तौर पर पैसे देने चाहे लेकिन मैंने लेने से इनकार कर दिया। मैंने पैसों के लिए उसकी मदद नहीं की थी।
रात को पैट्रोलिंग के दौरान में मर्दों की तरह कपड़े पहनती हूं। जब गांव में रात को कुछ होता है और मुझे वहां जल्दी पहुंचना पड़ता है तो मर्दों के कपड़ों में मोटरसाइकिल पर सवार होकर अपनी बंदूक के साथ निकलती हूं। ज़्यादातर समय ये बिजली की चोरी की घटना होती है जब कोई ग़ैर-कानूनी तरीके से अपने घर की वायरिंग करता है। मैं ऐसा नहीं करने दे सकती। हमें कानून का सम्मान करना ही पड़ेगा। एक या दो बार मैं ऐसे ही घर से निकली हूं और रास्ते में मैंने किसी को अपनी बाइक में लिफ़्ट भी दी है। बाइक से उतरने के बाद भी उन्हें ये एहसास नहीं हुआ कि एक महिला ने उन्हें घर तक छोड़ा।
जब तक मेरी रगों में खून दौड़ रहा है मैं अपने गांववालों के लिए काम करती रहूंगी। पिछले 10 सालों में मैंने जो काम किए हैं उसके लिए मुझे कभी कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। मैंने जो भी मुनाफ़ा कमाया उससे मैंने हमेशा गरीबों, अनाथों और दूसरे पब्लिक प्रोजेक्ट्स में मदद की क्योंकि मैं चाहती हूं कि मेरे लोग खुश रहें। मेरे मरने के बाद मेरे अपने बच्चों को खुद ही अपनी मदद करनी होगी। लेकिन अल्लाह मुझे लंबी उम्र बख्शे ताकि मैं अपने लोगों की मदद कर सकूं। लोग तो मुझे संसदीय चुनाव लड़ने की सलाह दे रहे हैं। इस वक्त मेरे पीछे 10 हज़ार लोगों का समर्थन है। वो चाहते हैं कि मैं उनकी सांसद बनूं। लेकिन फ़िलहाल मैं जो कुछ भी कर रही हूं उससे बहुत खुश हूं।