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जब एक सन्यासी ने पूरी दुनिया में बजाया था धर्म और अध्यात्म का डंका

Tue, 04 Jul 2017 01:00 PM IST
amarujala.com- presented by: विनोद शुक्ला
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स्वामी विवेकानन्दजी की आज पुण्यतिथि है इनकी मृत्यु आज  ही के दिन यानि 4 जुलाई 1902 को हुई थी। स्वामी विवेकानन्द ने अपने छोटे से जीवनकाल में ही भारतीय धर्म और आध्यात्म का डंका पूरी दुनिया में बजाया था। उनके द्वारा दी गई शिक्षा आज भी जीवन के अनमोल मंत्र के रुप में हमारे काम आती हैं। आइए जानते है धर्म और आध्यात्म के बारें स्वामी विवेकानन्द के कुछ अनमोल वचन।
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स्वामी विवेकानन्द साल 1893 में शिकागो मे सबसे पहले पूरी दुनिया को भारत के धर्म और आध्यात्म के सार से परिचित कराया था। उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया।
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विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म पर प्रभावी भाषण देकर वहां मौजूद लोगों का दिल जीत लिया था। वहां के अखबार 'न्यूयॉर्क हेरॉल्ड' ने लिखा, 'इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद सबसे महान व्यक्तित्व हैं। उन्हें सुनकर लगता है कि भारत जैसे ज्ञानी राष्ट्र में ईसाई धर्म प्रचारक भेजना मूर्खतापूर्ण है। वे यदि केवल मंच से गुजरते भी हैं तो तालियां बजने लगती हैं।

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विवेकानंद विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने गए थे। जब वो वहां पहुंचे तो आयोजकों ने उन्हें परेशान करने के लिए उनके नाम के आगे शून्य लिख दिया था। स्वामी विवेकानंद घबराए नहीं बल्कि उन्होंने भाषण की शुरूआत ही शून्य से कर डाली।
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 स्वामी विवेकानन्द कहा की पूजा का सार दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना है। काम में ईमानदारी और कर्मठता ही सच्ची पूजा है। 
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कोई तुम्हारी वंदना करें या निन्दा,लक्ष्मी आपके पास आए या न आए हमे कभी भी न्याय और धर्म के मार्ग से नहीं हटना चाहिए। 
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संसार से भागने वाले से व्यक्ति से  ज्यादा बड़ा वो है जो संसार में रहकर सांसारिक दुखों से जूझता है। लेकिन धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ता है। 
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