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मोक्ष की नगरी काशी में है कला का कुंभ, तस्वीरें देख हो जाएंगे कलाकारी के मुरीद

Wed, 19 Jun 2019 03:50 PM IST
Sayali Maurya पूजा सिंह,अमर उजाला,वाराणसी
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काशी धर्म, संस्कृति और साहित्य की राजधानी ही नहीं, कला की कुंभ नगरी भी है। मुगल कालीन कला से लेकर आज के रियलिस्टिक आर्ट की साक्षी है काशी। चित्रकला और मूर्तिकला से इतर बनारसी साड़ियां, काशी की काष्ठ कला, गुलाबी मीनाकारी और गंगा की रेत से निकले चमकीले पत्थरों से तराश कर बनने वाली मोतियों का कारोबार देश से लेकर विदेशों तक फैला हुआ है। आज विश्व एथनिक दिवस पर हम काशी के ऐतिहासिक कला और कलाकारी के बारे में बताएंगे, जिसने अपनी पहुंच विश्व फलक तक बनाई है। तस्वीरों में देखें काशी के कला की खूबसूरती....
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काशी की कलात्मक हस्ताक्षर हैं यहां की सिल्क की साड़ियां। इनकी कला की बात करें तो आंखों से लेकर जेहन तक में बनारसी साड़ियां इतराती हुई नजर आती हैं। सदियों पुरानी इस कला ने काशी को एक नई पहचान दी है। यहां के बुनकरों की कारीगरी छोटी-छोटी कोठरियों से लेकर बड़े-बड़े शो रूम तक फैली हुई है। रेशम पर सोने-चांदी और ऐसे ही चमकीले तारों से कशीदाकारी कर बुनकरों ने पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है।
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काष्ठ खिलौने
काशी की कला का जिक्र लकड़ी के खिलौनों के बिना अधूरा है। यहां की काष्ठ कला भी सदियों पुरानी मानी जाती है। रामचरित्र मानस में जिक्र है कि भगवान राम बाल्यकाल में भाइयों के साथ लकड़ी के खिलौनों से ही खेलते थे। पहले यहां लकड़ी के खिलौने और सिंदूरदान ही बनाए जाते थे, लेकिन अब काष्ठ कला का रूप व्यापक हो गया है। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास और घाटों पर इनके कई केंद्र हैं।

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रेत से निकले पत्थरों के आभूषण
किसी ने नहीं सोचा होगा कि गंगा की रेत से निकलने वाले चमकीले पत्थरों का कारोबार विदेशियों को भी अपना मुरीद बना लेगा। यह कला घाट की सीढ़ियों से लेकर बड़े आलीशान शोरूम तक फैल चुकी है। सरसों के दाने से लेकर मुट्ठी भर के बड़े पत्थरों से बनी माला काशी की गलियों से लेकर विदेश तक पहुंच गई है। 
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गुलाबी मीनाकारी
दूसरी ओर गुलाबी मीनाकारी सोने-चांदी से निर्मित आभूषण हो या सजावटी सामान, सबकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही है। काशी से विलुप्त हो रही इस शिल्पकला को जीआई सर्टिफिकेशन मिलने के बाद इसके प्रति रुझान बढ़ा गया है। धातु के गहनों, सामन या बर्तनों की ऊपरी सतह करीने से रंगने के बाद उन पर गुलाबी मीनाकारी का काम किया जाता है। गुलाबी रंग चढ़ाने की तकनीक के ही कारण यहां की मीनाकारी दुनिया में मशहूर है। इस कला के प्रति रुचि लेकर अब यहां की बेटियां इसे बनाने का प्रशिक्षण ले रही हैं। 
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क्यों मनाया जाता है विश्व एथनिक दिवस :
विश्व संस्कृति के संरक्षण तथा उसे सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इस दिवस को हर साल 19 जून को मनाया जाता है। बॉलीवुड अभिनेत्री विद्या बालन इस दिवस की ब्रांड एंबेसडर हैं। इस दिवस को मानने का मुख्य उद्देश्य धूमिल हो रही हथकरघा की कला और कलाकारों के पलायन को रोकने के साथ विश्व भर में अलग-अलग क्षेत्रों की ऐतिहासिक विरासत, सभ्यता, मानव जाति, विज्ञान, कला और संस्कृति के संरक्षण और उनको सहेजने के लिए जागरूकता पैदा करना है।
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