बड़ा लालपुर स्थित हस्तकला संकुल में रखा छह फिट का अशोक स्तंभ आकर्षण का केंद्र बना है। यहां आने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग इसके साथ सेल्फी लेना नहीं भूलते। दरअसल यह वाराणसी वुड कार्विंग का नायाब उदाहरण है। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें...
विज्ञापन
2 of 7
वाराणसी वुड कार्विंग
- फोटो : अमर उजाला
बनारस में 500 से ज्यादा शिल्पी इस कार्य में जुड़े हैं जो लकड़ी को ऐसा आकार देते हैं कि हर देखने वाले की नजर ठहर जाती है। दो से ढाई साल से बनारस में वुड कार्विंग का काम हो रहा है। पहले हाथी दांत पर नक्खासी का काम होता था।
विज्ञापन
3 of 7
वाराणसी वुड कार्विंग
- फोटो : अमर उजाला
ब्रिटिश काल में हाथी दांत दक्षिण अफ्रीका से आते थे और उस पर नक्खासी के बाद बाहर भेज दिए जाते थे। हाथी दांत पर प्रतिबंध लगने के बाद चंदन की लकड़ी पर यह काम शुरू हुआ। जब इस पर भी प्रतिबंध लग गया तो कैमी की लकड़ी पर काम हो रहा है।
4 of 7
वाराणसी वुड कार्विंग
- फोटो : अमर उजाला
वुड कार्विंग से भगवान बुद्ध की मूर्ति, अशोक स्तंभ आदि बनाए जाते हैं। इसके अलावा चिलम, पेपरवेट सहित जानवरों की आकृतियां भी बनती हैं। लकड़ी से सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं। प्रेम शंकर विश्वकर्मा ने लकड़ी से निर्मित सबसे बड़ा अशोक स्तंभ बनाया जो संकुल में रखा है। कमल के फूल की आकृति चंद्र प्रकाश विश्वकर्मा ने बनाई है।
विज्ञापन
5 of 7
वाराणसी वुड कार्विंग
- फोटो : अमर उजाला
इस कला को हस्तकला संकुल में जगह मिलने से प्रेम शंकर विश्वकर्मा, चंद्र प्रकाश विश्वकर्मा, संतोष, राजेश, महेष प्रसाद, संदीप विश्वकर्मा, राजेश विश्वकर्मा उत्साहित हैं। इस शिल्प के जीआई का प्रयास ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा किया जा रहा है।
विज्ञापन
6 of 7
वाराणसी वुड कार्विंग
- फोटो : अमर उजाला
लकडी को छीलकर अलंकृत करने या मूर्ति बनाने को अंग्रेजी में कार्विंग कहते हैं। उत्कीर्णन के लिए लकड़ी को सावधानी से सुखाना होता है। शीशम, ओक और लकड़ियों पर सूक्ष्म उत्कीर्णन किया जा सकता है। मोटा काम प्राय: सभी लक ड़ियों पर हो सकता है।
उत्कीर्णन के लिए चपटी और गोल रुखानियों तथा छूरी का प्रयोग किया जाता है। काठ की मुंगरी (हथौड़ा) भी प्रयोग में लाई जाती है। बारीक काम में रुखानी को ठोंका नहीं जाता। केवल एक हाथ की गदोरी में दबाया जाता है और दूसरे हाथ की अंगुलियों से उसके अग्र को नियंत्रित किया जाता है।