विंध्याचल का नवरात्र मेला 29 मार्च को शुरू हो जाएगा। मां विंध्यवासिनी का दर्शन पूजन करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी है। प्रशासन द्वारा मेले को सकुशल संपन्न कराने के लिए सुरक्षा व्यवस्था के विशेष प्रबंध किया गया है। आगे की स्लाइड्स में जानें विंध्याचल धाम की खास बातें...
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देवीधाम में भक्तजनों का रेला
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हजारों वर्षों से ज्ञान प्राप्ति की तपोस्थली विंध्याचल एक ऐसा जागृत पीठ है, जहां वैदिक व वाम मार्गी दोनों पद्धतियों से पूजन होती है। विंध्याचल ऐसा सिद्ध पीठ है, जहां मां विंध्यवासिनी अपनी दस अन्य शक्तियों के साथ विद्यमान हैं, जिसे दस महाविद्या का प्रधान केंद्र कहा जाता है।
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यहां जगदंबा अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में ही त्रिकोण का निर्माण करतीं हैं। विंध्याचल से गंगा मां विंध्यवासिनी का रज लेकर शिव की नगरी काशी ओर प्रस्थान करतीं हैं। यहीं पर मुनि अगस्त्य ने सभ्यता और संस्कृति के प्रचार प्रसार की ज्ञान यात्रा आरंभ की और यह वही क्षेत्र है, जहां सप्त ऋषियों को ज्ञान प्राप्त हुआ।
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मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल की देवी मां विंध्यवासिनी। विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की पवित्र धाराओं की कल-कल करती ध्वनि, प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती है।हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन जय मां विंध्यवासिनी के उद्घोष के साथ करते हैं।
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विंध्याचल धाम
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मां विंध्यवासिनी का पूजन वैदिक रीति से होता है जबकि इनकी दस महाशक्तियों का पूजन वाम मार्गी तांत्रिक पद्धति से होता है। यहां साधना करने वाले को शीघ्र ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। विंध्य क्षेत्र के त्रिकोण का अपना एक अलग ही महत्व है। किसी अन्य पीठ में ऐसी त्रिकोण यात्रा का विधान नहीं है।
यहां जगदंबा अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में ही त्रिकोण का निर्माण करतीं हैं, जो इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया की देवियां हैं। हजारों मील का सफर करने वाली पतित पावनी गंगा धरती पर आकर विंध्य क्षेत्र में ही आदि शक्ति विंध्यवासिनी का पांव पखार कर त्रैलोक्य न्यारी शिवधाम काशी में प्रवेश करती है । हजारों मील लम्बे विंध्य पर्वत एवं गंगा नदी मिलन माता के धाम विंध्याचल में ही होता है ।