सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण के मुद्दे को काशी की आम जनता ने भी सराहा है। एक तबका आरक्षण के बजाय युवा वर्ग को स्वावलंबी बनाने की योजनाओं को बढ़ाने के पक्ष में है। लोगों का कहना है कि गरीब सवर्णों को मिलने वाले आरक्षण से ज्यादा लाभ नहीं होगा। उधर, राजनीतिक दल से इसे चुनावी शिगूफा बताने में लगे हैं। सोशल मीडिया पर भी आरक्षण पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आरक्षण को लेकर लोग दो वर्गों में बंटे नजर आ रहे हैं। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें...
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Social Media
काशी विद्यापीठ के विधि संकाय के अध्यक्ष प्रो. चतुर्भुज नाथ तिवारी ने कहा कि केवल आरक्षण की बात करने से भला होने वाला नहीं है, चाहे वह किसी भी वर्ग के हों। सरकारी नीति की वजह से नौकरियों का अभाव है। पेंशन की व्यवस्था भी समाप्त हो गई है। ऐसे में मूलभूत समस्याओं की तरफ ध्यान देने की जरूरत है।
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सुप्रीम कोर्ट
निर्दल पार्षद अजीत सिंह ने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण को बैसाखी कहने वाला वर्ग भी आज उसी बैसाखी की सवारी करने को तैयार है। अहम सवाल यह है कि क्या अब मेरिट का दायरा सिमट जाएगा? क्या मेरिट की लड़ाई 60 फीसदी बनाम 40 फीसदी होगी?
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राज्यसभा में कोटा बिल पर बहस
नमामि गंगे के संयोजक राजेश शुक्ला ने कहा कि यह पहला अवसर है जब देश में गरीब की जाति स्वीकार की गई है। वर्तमान में अगड़ी जाति में भी काफी लोग गरीब हैं। समता और समानता का ऐतिहासिक पल है। सवर्ण गरीबों के आरक्षण से सामाजिक न्याय की जीत हुई है।
चौक निवासी पनसारी विष्णु ने कहा कि पहली बार किसी सरकार ने गरीब सवर्णों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने का फैसला किया है। निश्चित तौर पर इसका लाभ एक बड़े तबके को मिलेगा। वहीं सिगरा निवासी कुलवंत सिंह ने कहा कि मोदी सरकार आरक्षण के मुद्दे पर सभी वर्ग के लिए अच्छा काम कर रही है। बशर्ते नीचे बैठे अफसर उसे सही ढंग से अमली जामा पहनाने का काम करें।