समलैंगिकता के मुद्दे पर फैसला सुनाते हुए गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यौन झुकाव को प्राकृतिक बताया है और कहा कि इसे लेकर किसी तरह का भेदभाव संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर जिले के कानूनविदों, समाजशास्त्रियों और धर्माचार्यों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं जाहिर की हैं। आगे की स्लाइड्स में देखें....
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arvind joshi
- फोटो : amar ujala
बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद जोशी ने कहा कि जीवन व स्वतंत्रता के अधिकारों की दलील एवं आधुनिकता के आधार पर समलैंगिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। दो बालिग सहमति से यौन संबंध स्थापित कर सकते हैं, इसको जब हम भारतीय समाज की स्थापित संस्थाओं के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि इससे समाज में अनेक समस्याएं पनपेगी। इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।
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Rameshwar pur
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अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी ने कहा कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृत और संस्कारों के खिलाफ है। न्यायपालिका के निर्णय पर हम कोई टिप्पणी नहीं करेंगे लेकिन हमें समाज के उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों का ध्यान रखना चाहिए। काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री पं. दीपक मालवीय ने कहा कि समलैंगिकता एक प्रकार की कुप्रवृत्ति है। इस पर हर किसी को नियंत्रण रखना चाहिए। ऐसी चीजें समाज को गर्त की ओर ले जाएंगी।
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varanasi
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बीएचयू के विधि संकाय के पूर्व डीन प्रो. एमपी सिंह ने कहा कि भारत ही नहीं पूरी दुनिया में समलैंगिकता आदिकाल से चली आ रही है। इस फैसले से समाज में कोई उथलपुथल या अराजकता नहीं होने जा रही है। अब फर्क यह होगा कि समलैंगिक लोगों के खिलाफ कार्रवाई का पुलिस को जो अधिकार मिला था और जिससे ये लोग डरे-सहमे रहते थे, अब यह सब खत्म हो जाएगा। हम इसे ऐतिहासिक फैसला मानते हैं।
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varanasi
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सेंट्रल बार के महामंत्री संजय सिंह दाढ़ी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश समाज के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है और इसका बुरा असर पड़ेगा। अधिवक्ता अनुज यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय सोच-समझ कर दिया है। हम सभी कानून के दायरे में रहते हैं इस वजह से इस निर्णय का सम्मान करते हुए हमें इसे मानना चाहिए।
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LGBT India
यूपी बार कौंसिल के पूर्व सदस्य श्रीनाथ त्रिपाठी ने कहा कि अप संस्कृति को बढ़ावा देना किसी के लिए उचित नहीं है। हम स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक नहीं ले जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति के मुताबिक ही सभी मामलों को देखा जाना चाहिए। सेंट्रल बार के पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंह प्रिंस ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने देश की आत्मा के विरुद्ध जाकर फैसला दिया है। हमारे महान देश के डीएनए में समलैंगिकता शामिल नहीं हैं।
सेंट्रल बार के पूर्व महामंत्री दुर्गा प्रसाद सेठ ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा को छद्म आधुनिकता ने तार-तार कर दिया है। अप्राकृतिक कृत्यों को कानूनी जामा पहना कर हम अपनी अंतरात्मा और संस्कारों की हत्या करने पर आमादा हैं।