बनारस में कैंट रेलवे स्टेशन के समीप निर्माणाधीन चौकाघाट-लहरतारा फ्लाईओवर के दो बीम गिरने से हुए हादसे की शुरू हुई तफ्तीश में सेतु निगम के इंजीनियरों की बड़ी लापरवाही सामने आई है। पता चला है कि फ्लाईओवर के निर्माण कार्यों की समुचित निगरानी नहीं की जा रही थी। आगे की स्लाइड्स देखें...
विज्ञापन
2 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
आपको जानकर हैरान होगी कि सेतु निगम के सीनियर इंजीनियर मौके पर जाते ही नहीं थे। वह तो सिर्फ मंत्रियों, प्रशासनिक उच्चाधिकारियों के निरीक्षण के दौरान ही मौके पर नजर आते थे। उनकी इस ढिलाई का मातहतों ने भी भरपूर फायदा उठाया। कई महत्वपूर्ण काम भी मजदूरों के भरोसे छोड़ दिए जाते थे। जिस दिन हादसा हुआ, उस दिन भी निगरानी के लिए कोई अभियंता मौजूद नहीं था। अगर सेतु निगम के सीनियर इंजीनियर ढंग से ध्यान देते हुए मौके पर लगातार निगरानी रखते और दिशा-निर्देश देते रहते तो इतना बड़ा हादसा नहीं होता।
विज्ञापन
3 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
वहीं लहरतारा स्थित कैंसर अस्पताल से चौकाघाट के बीच निर्माणाधीन फ्लाईओवर की दो बीम के गिरने की जांच तकनीकी समिति, मजिस्ट्रेट और पुलिस अलग-अलग कर रही है। शुरुआती दौर की तफ्तीश में यह सामने आया है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के दौरे को छोड़ कर सामान्य तौर पर सेतु निगम के वरिष्ठ अधिकारी निर्माणाधीन परियोजना का यदाकदा ही मुआयना करते थे। उनके इस लापरवाह रवैये का फायदा मातहत उठाते थे।
4 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
सेतु निगम के अधिकारियों के स्तर से इस बात की भी कभी परवाह नहीं की गई कि वाहनों की आवाजाही के बीच निर्माणाधीन कार्यों से जोखिम हो सकती है। सुरक्षा मानक दरकिनार कर काम कराए जा रहे थे। सेतु निगम के साथ ही ट्रैफिक पुलिस और जिला प्रशासन ने भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया और जिम्मेदार आंखें बंद किए रहे।
विज्ञापन
5 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
हादसे की मजिस्ट्रियल जांच के लिए अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व मनोज कुमार राय को जांच अधिकारी नामित किया गया है। बृहस्पतिवार को जांच अधिकारी के पास बयान दर्ज कराने के लिए कोई भी प्रत्यक्षदर्शी नहीं पहुंचा। जांच अधिकारी ने ट्रॉमा सेंटर जाकर तीन घायलों के बयान दर्ज किए।
जांच 18 मई को पूरी होनी है लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का बयान और अन्य तथ्यों का संकलन अब तक न होने से मुश्किलें बनी हुई हैं। ऐसी स्थिति में माना जा रहा है कि तथ्यों की छानबीन के लिए मजिस्ट्रियल जांच की समयसीमा बढ़ाई जा सकती है।