इस समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो दूसरों की मदद में विश्वास रखते हैं। बीएचयू परिसर में गुरुवार को इसका जीता जागता उदाहरण देखने को मिला। यहां जो कुछ भी हुआ, उसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। दिव्यांग छात्रा की मदद की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। यहां फीस जमा न हो पाने से निराश दिव्यांग छात्रा की फीस खुद जीआरपी कैंट प्रभारी ने भरी। आगे की स्लाइड्स में देखें..
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varanasi
- फोटो : facebbok
बिहार के बेतिया जिले के एक गांव से दाखिला लेने आई एक छात्रा की 21,000 रुपये फीस जमा कर एक नई मिसाल पेश की। छात्रा का प्रवेश बीएचयू से संबंद्ध आर्य महिला पीजी कॉलेज में बीकॉम के लिए हुआ था। दिव्यांग छात्रा की काउंसलिंग छह जुलाई को हुई थी। इस बीच 11 जुलाई की शाम पांच बजे विश्वविद्यालय से एक घंटे के भीतर फीस जमा करने का फोन आया। गांव में रहने वाली छात्रा इंटरनेट की सुविधा न होने की वजह से फीस जमा नहीं सकी।
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय
- फोटो : अमर उजाला
मन में पढ़ने की ललक थी तो वह गुरुवार को बीएचयू पहुंच गई। विश्वविद्यालय आकर वाणिज्य संकाय गई तो वहां पता चला कि अब फीस जमा करने की वेबसाइट बंद हो गई। थक हार कर वह किसी तरह भोजपुरी अध्ययन केंद्र के पास आकर भाई के साथ बैठ गई। यहां शोध छात्रा प्रियंका उससे बात कर रही थी। तभी केंद्र में पहुंचे शोध छात्र शैलेंद्र सिंह और साथियों की नजर उस पर पड़ी।
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- फोटो : अमर उजाला
इन लोगों ने उसे संबंधित अधिकारियों के पास भेजा तो वहां से भी समस्या हल नहीं हुई। इसके बाद छात्र अरुण चौबे, आशीष कुमार, पतंजलि पांडेय, सनी पांडेय, शुभम तिवारी डीआर एकेडमिक कार्यालय पहुंचे। करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद डीन कामर्स, डीआर एकेडमिक और प्रवेश कमेटी चेयरमैन की सहमति के बाद पोर्टल खुला तो पता चला कि छात्रा का प्रवेश आर्य महिला पीजी कॉलेज में हुआ था, जहां 21 हजार फीस लगेगी।
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digital payment
छात्रा को पता था कि उसका कैंपस में प्रवेश होगा, इसलिए वह उसकी फीस 3600 की जगह चार हजार लेकर आई थी। इसी बीच डीआर एकेडमिक कार्यालय में किसी काम से आए जीआरपी कैंट प्रभारी अशोक कुमार दूबे बहुत देर से यह सब देख रहे थे। उन्होंने छात्रा को चिंतित देख पहले पूछा बाद में परिवार वालों से बातचीत की। जब यह पता चला कि परिवार वाले उसकी फीस नहीं जमा कर सकते तो उन्होंने तुरंत उसकी फीस 21,000 रुपये जमा कर दिया।
अमर उजाला से बात करते हुए जीआरपी प्रभारी अशोक कुमार दूबे ने कहा कि छात्रा को निराश देख मुझसे रहा नहीं गया। घर वालों से बात करने पर जब पता चला कि फीस बहन करने में सक्षम नहीं है। इस दौरान कार्यालय में अपना एटीएम दिया और उसकी फीस जमा करा दी। अब उसका साल बर्बाद नहीं होगा।