कैंसर जैसी बीमारी का शिकार हो चुकी और इस जंग में जीत चुकी मशहूर फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोइराला इन दिनों चर्चा में हैं। उन्होंने अपने कैंसर से संघर्षो एवं निजी बातों को 'हील्ड' नामक पुस्तक में बयां किया है। मनीषा, हाल ही में संजय दत्त पर बनी बायोपिक फिल्म में नजर आईं थीं। बहुत कम ही लोगों को पता होगा कि नेपाली राज परिवार से ताल्लुक रखने वाली मनीषा कोइराला का बचपन यूपी में बीता है। उन्होंने यहीं से 12वीं तक की पढ़ाई की। मनीषा कोइराला अपने बचपन के दिनों को याद कर आज भी भावुक हो जाती हैं।
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- फोटो : अमर उजाला
सुभाष घई की सौदागर फिल्म से हिंदी सिनेमा में आगाज करने वाली और 1942 ए लव स्टोरी जैसी यादगार फिल्म देने वाली मनीषा कोइराला इन दिनों अपने परिजनों के साथ वाराणसी में हैं। नेपाल की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले बीपी कोइराला परिवार का बनारस से आत्मीय रिश्ता रहा है। मनीषा कोईराला का बचपन यहीं बीता और उन्होंने यहां कमच्छा स्थित वसंता कन्या महाविद्यालय में पढ़ाई की।
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मनीषा भले ही नेपाल के राज घराने से ताल्लुक रखतीं हो लेकिन उनकी जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव आये हैं। राजघराने से बॉलीवुड की हिरोइन बनने, फिर शादी और कुछ ही सालों में तलाक, बाद में कैंसर जैसी बीमारी से जूझ कर बाहर निकलने तक मनीषा कोइराला का जीवन खुद एक फिल्म की कहानी जैसा रहा है। मनीषा बचपन बेहद साधारण माहौल में बीता है, जिसमें बहुत सारे आदर्श और बहुत सारी शिक्षाएं थीं। उनकी दादी भरतनाट्यम व मणिपुरी डांसर थीं, जबकि मां कथक डांसर। लिहाजा घर पर शास्त्रीय गीत-संगीत का अच्छा-खासा माहौल था। तीन साल की उम्र से ही उन्हें नृत्य सिखाया जाने लगा था।
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मनीषा जब भी वाराणसी आती हैं तो अपने दोस्तों से मिलना नहीं भूलतीं। अभी भी वो अपने दोस्तों के साथ संपर्क में हैं। मनीषा शुक्रवार की देर शाम काशी पहुंचीं थी। उन्होंने अपने परिजनों के साथ बाबा विश्वनाथ, विंध्याचल, कैथी स्थित मार्केंडय महादेव धाम में दर्शन-पूजन किया। साथ ही अपने स्वास्थ्य के लिए कामना भी की। कोइराला परिवार का काशी से काफी जुड़ाव रहा है। अपने पारिवारिक मित्र प्रो. सुरेन्द्र प्रताप के आतिथ्य में कोइराला परिवार ने लंबे समय तक काशी में बिताए पलों को साझा किया।
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नेपाल की राजनीति में उठा पटक होने के कारण मनीषा कोइराला अपनी दादी के साथ वाराणसी आ गईं। उनकी शुरुआती पढ़ाई वाराणसी के वंसत कन्या महाविद्यालय से हुई। उसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चली गईं। मनीषा बचपन से डॉक्टर बन दूसरों की सेवा करने की चाहत थी, लेकिन मॉडलिंग ने उनके लिए फ़िल्मी दुनिया के द्वार खोल दिए।
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मनीषा ने कहा कि कैंसर से मुक्त होने में बनारस से जुड़ी यादें मुझे हर पल हौसला देती थीं।बचपन में यहां गुजारे समय का संस्मरण साझा के दौरान अभिनेत्री ने बताया कि उस समय हमारे पड़ोस में रहने वाले साहित्यकार डा. बच्चन सिंह ने मुझे लिखना-पढ़ना सिखाते थे। कैंसर से लड़ाई के दौरान मैंने जो अनुभव किया है उसे एक किताब की शक्ल दी है। उसका नाम रखा ‘हील्ड (मैं ठीक हो गई) रखा है।
मनीषा के फिल्मी करियर की शुरुआत साल 1991 में सुभाष घई निर्देशित फिल्म सौदागर से हुई थी। यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर हिट फिल्म साबित हुई थी। मनीषा कोइराला एक गैर-फिल्मी परिवार से थीं। उसके बावजूद उन्होंने उस दौर में खुद को अभिनय से हिंदी सिनेमा में सर्वश्रेठ अभिनेत्रियों में शुमार कर लिया था।