सुखद संयोग है कि अक्टूबर को देश के दो महापुरुषों की जयंती है और दोनों का बनारस के एक संस्थान से गहरा नाता है। महात्मा गांधी ने इस संस्थान की नींव रखी थी और बाद में यहीं से लाल बहादुर ने शास्त्री की उपाधि ली। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें...
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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ।
दो अक्टूबर को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ दोहरी खुशी मनाता है। महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन में विद्यापीठ की महती भूमिका तय की थी। बाद में यह पूर्वांचल समेत पूरे प्रदेश में यह अध्ययन का प्रतीष्ठित केंद्र बना। गुलामी की जंजीर में जकड़े इस देश को आजादी की राह पर ले जाने के उद्देश्य से महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की स्थापना दस फरवरी 1921 को की गई थी।
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महात्मा गांधी
बापू से प्रेरणा लेकर बाबू शिव प्रसाद गुप्त और भगवान दास ने काशी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की। महात्मा गांधी ने खुद इसकी आधारशिला रखी थी। शिलान्यास के दौरान पंडित मोतीलाल नेहरू, मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसी कई शख्सियतें शामिल थीं।
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mahatma gandhi
बापू ने करीब सप्ताह भर इसी अध्ययन केंद्र में रहकर देश की आजादी की रणनीति बनाई। यहां सूत भी काता। मानविकी संकाय में बापू भवन इसका साक्षी है। इस महान विश्वविद्यालय से बापू का नाता तो कुछ ऐसा था, लेकिन देश के दूसरे प्रधानमंत्री और काशी के ‘लाल’ लाल बहादुर शास्त्री की भी जड़ें इस विश्वविद्यालय से जुड़ी हैं।
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लाल बहादुर शास्त्री
सिर्फ चंद्र शेखर आजाद नहीं, शास्त्री जी भी इस विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। 1926 में काशी विद्यापीठ से उन्होंने शास्त्री की उपाधि ली थी। जब वो यहां पढ़ाई कर रहे थे, उसी दौरान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से भी जुड़े।
17 साल की उम्र में वो जेल भी गए। 1930 में वो गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से भी जुड़े और देश के राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी अहम भूमिका निभाई। बापू और शास्त्री से गहराई से जुड़े रहने वाले काशी विद्यापीठ के लिए दो अक्तूबर किसी स्वर्णिम पल से कम नहीं होता।