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छठा और सातवां चरण नहीं है आसान, भाजपा प्रत्याशियों संग प्रभारियों की भी होगी जातिगत गणित की परीक्षा

Thu, 09 May 2019 01:48 PM IST
Sayali Maurya प्रदीप मिश्र,अमर उजाला,वाराणसी
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लोकसभा चुनाव के छठे और सातवें चरण में जातीय समीकरणों के हावी होने के कारण भाजपा गठबंधन की चुनौती बढ़ गई है। 2014 में भाजपा अपना दल से समझौता कर चुनाव मैदान में उतरी थी। सपा और बसपा ने भी अलग-अलग चुनाव लड़ा था। पूर्वांचल में आजमगढ़ में सपा के अलावा विपक्ष को सीट नहीं मिली थी। भाजपा इस बार इस सीट को हर हाल में जीतना चाहती है। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में....
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इस बार सपा-बसपा गठबंधन के चलते बदले सामाजिक समीकरण की वजह से पांच साल की सरकार के बावजूद भाजपा पूर्व प्रदर्शन दोहराने को लेकर पूरी तरह निश्चिंत नहीं है। गठबंधन को परास्त करने और पहले जैसे परिणाम के लिए भाजपा ने लोकसभा प्रभारियों के साथ ही जिला प्रभारी, लोकसभा संयोजक, बूथ प्रभारी से लेकर पन्ना प्रभारियों को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। 
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भाजपा की व्यूह रचना देखने-समझने में तो विपक्ष के मुकाबले मजबूत लगती है पर पार्टी को मालूम है कि मतदान का ट्रेंड यदि पांच साल पहले जैसा रहा तो जीत आसान नहीं होगी। आंकड़े बताते हैं कि 2014 में वाराणसी, मिर्जापुर और आजमगढ़ मंडल में भाजपा को तीन सीट पर ही निर्णायक बढ़त थी। आंकड़ों के हिसाब से प्रत्याशियों से लेकर प्रभारी उधेड़बुन में हैं कि सपा-बसपा गठबंधन की मजबूत गांठ को कैसे कमजोर किया जाए।

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पूर्वांचल में जातिगत गणित हर चुनाव में अहम रहा है। प्रभावशाली जातियों में ब्राह्मण और राजपूत पहले से गिने जाते हैं तो भाजपा ने सवर्णों और भूमिहारों, सपा ने यादव, बसपा ने दलित, अपना दल ने कुर्मी, सुभासपा ने राजभर बिरादरी को अपने-अपने पक्ष में मजबूती से लामबंद कर रखा है। यादव, दलित और मुसलमानों के संभावित गुणा-भाग के मद्देनजर ही भाजपा ने अपनी चुनावी सांगठनिक संरचना बनाई है। पांच चरणों के चुनाव के बाद खाली हुए मंत्रियों और नेताओं को भी अलग-अलग जातियों और धार्मिक समूहों के बीच माहौल बनाने का काम सौंपा गया है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वाराणसी के आसपास के इलाकों की घेराबंदी करने में जुट गए हैं। भदोही की मीटिंग में भदोही जिले का नाम संत रविदास नगर खत्म करने का मुद्दा उन्होंने इतने प्रभावशाली ढंग से उठाया कि मायावती और अखिलेश के लिए सार्वजनिक मंच से जवाब देना जरूरी हो गया। वहीं भाजपा के छोटे-बड़े नेता सपा-बसपा के बीच पुराने दिनों की कड़वाहट को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित कर दोनों दलों के वोट एक ही प्रत्याशी को ट्रांसफर होने से रोकने की परीक्षा में पास होने के लिए पसीना बहा रहे हैं।
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विपक्ष ने भाजपा की इस रणनीति की काट निकाल ली है। अव्वल तो सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती संयुक्त सभाएं कर रही हैं। वहीं सपा-बसपा गठबंधन के स्थानीय बड़े नेताओं ने अंदरखाने सेंधमारी शुरू कर दी है। अपने वोट सहेजने से ज्यादा नजर भाजपा से किसी भी वजह से नाराज मतदाताओं को अपने पाले में लाने पर है। लेकिन कामयाबी नहीं मिलने पर भाजपा के गठबंधन धर्म का पालन न करने की जानकारी दी जाती है। ऐन चुनाव के मौके पर सुभासपा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की भाजपा द्वारा उपेक्षा इसका बड़ा उदाहरण है। 
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बताया जा रहा है कि अपना दल के साथ-साथ मां-बेटी को अलग-अलग करने के बावजूद अपना दल (एस) के साथ गठबंधन की औपचारिकता पूरी की गई है। गैर सपाई-बसपाई मतदाताओं को सुभासपा के पक्ष में मतदान या फिर नोटा के लिए प्रेरित किया जा रहा है। 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले मऊ में सुभासपा से गठबंधन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने किया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा दोनों इस वोट बैंक को अपने-अपने लिए इस्तेमाल करना चाहेंगी। 
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