अगले एक साल में देश में तीन किलोमीटर तक लंबी ट्रेनें चल सकती हैं। इन ट्रेनों में तीन से चार इंजन ही नहीं लगेंगे, इन्हें केवल एक पायलट अपने सहयोगी के साथ चला सकेगा। डीजल रेल कारखाना (डीरेका) में रेडियो फ्रीक्वेंसी तकनीक वाले इंजनों के उत्पादन के बाद ऐसा संभव होगा।
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ट्रेन हादसा
डीरेका ने इंजनों में रेडियो फ्रीक्वेंसी तकनीक का इस्तेमाल करने का लाइसेंस हासिल कर लिया है। इंजनों का उत्पादन आठ से दस महीने में भी पूरा हो सकता है। इससे पहले ऐसी तकनीक वाले इंजनों का प्रयोग पहाड़ी क्षेत्र, सीधी चढ़ाई या लंबी ट्रेनों में किया जाएगा।
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- फोटो : File Photo
2018 तक प्रस्तावित फ्रेट कॉरिडोर में चलाई जाने वाली दोगुनी या उससे लंबी मालगाड़ियों के संचालन में भी डीरेका की इसी तकनीक का इस्तेमाल होगा। डीरेका के उप महाप्रबंधक मनीष कुमार गुप्ता के मुताबिक डिस्ट्रीब्यूटेड पॉवर कंट्रोल सिस्टम तकनीक में एक मास्टर इंजन होगा।
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- फोटो : अमर उजाला
इससे अधिकतम तीन इंजन जोड़े जा सकेंगे। इंजन भी एक साथ नहीं बल्कि रेल गाड़ी के आगे, बीच में और पीछे जोड़े जाएंगे। नई तकनीक के इंजन आने के बाद मास्टर इंजन में पायलट और को-पायलट बैठेगा।
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- फोटो : अमर उजाला
मास्टर इंजन से रेडियो फ्रीक्वेंसी के माध्यम से अन्य रेल इंजनों को जो कमांड दिया जाएगा, इंजन वैसे ही काम करेंगे। पायलट इंजन जिस नोज पर चलेगा, अन्य इंजन भी उसी नोज में हो जाएंगे। एक में ब्रेकिंग होगी तो सभी में ब्रेकिंग होगी।