सनातन धर्म में भगवान श्रीगणेश सबसे पहले पूजे जाते हैं। किसी भी कार्य की शुरुआत बिना गणेश पूजन के नहीं होती। इसलिए गणेश को मंगलकर्ता और विघ्नहर्ता भी बोलते हैं। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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श्री गणेश का प्राकट्य महोत्सव 24 जनवरी को है गणेश जी माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को प्रकट हुए थे इसलिए यह दिन संकष्टी गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस बार संकष्टी गणेश चतुर्थी 23 जनवरी बुधवार की आधी रात 11:59 पर लगेगी और अगले दिन 24 जनवरी गुरुवार की रात 8:54 तक रहेगी। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर गणेश जी की पूजा की जाती है।
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Ganesh Chaturthi
ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि व्रत के दिन सुबह सभी नित्य कर्म करके अपने इष्ट देवी देवता की पूजा करने के बाद गणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूरे दिन निराहार और निराजन व्रत रखना चाहिए। शाम के समय फिर से स्नान करके गणेश जी की पंचोपचार दशोपचार या षोडशोपचार पूजा अर्चना करनी चाहिए।
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- फोटो : god
गजानन को दूब और लड्डू बहुत पसंद है, इसलिए उन्हें दूब की माला, फल, मेवे और लड्डू जरूर चढ़ाना चाहिए। गणेश प्राकट्य महोत्सव पर तिल और गुड़ से बने लड्डू चढ़ाने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और गणेश जी प्रसन्न होंगे।
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Ganesha
इस व्रत को महिला पुरुष के साथ-साथ विद्यार्थी भी रख सकते हैं। क्योंकि नाम के अनुसार संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत सभी कष्टों को हर लेता है और सभी मनोकामनाएं पूरी करता है। संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत 4 साल या 14 साल तक करने से गणेश जी की कृपा आप और आपके परिवार पर बनी रहती है।
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worship
विमल जैन ने बताया कि श्री गणेश की विशेष कृपा पाने के लिए श्री गणेश स्तुति, संकटनाशन श्री गणेश स्तोत्र, श्री गणेश सहस्त्रनाम, गणेश चालीसा और गणेश का मंत्र स्तोत्र जरूर करना चाहिए। श्री गणेश पुराण के अनुसार पूरी आस्था के साथ किए गए संकष्टी गणेश चतुर्थी के व्रत से जीवन में सुख समृद्धि और खुशहाली की वृद्धि होती है। साथ ही सभी कष्टों से निवारण मिलता है।
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- फोटो : god
श्री गणेश की प्राकृतिक कथा का वर्णन ब्रह्मपुराण में है। उसमें लिखा है कि मां पार्वती ने अपने देश की मेल से भगवान गणेश का सृजन किया और उन्हें द्वार पर बिठाकर स्नान करने चली गई। तभी वहां उनके पति शिव जी आ गए और गणेश ने मां की आज्ञा अनुसार शिव जी को अंदर नहीं जाने दिया।
इस पर शिवजी क्रोधित हो गए और गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। गणेश जी का सिर चंद्रमा पर जाकर टिक गया। बाद में शिव जी ने नवजात हाथी का सिर गणेश जी को लगा दिया। गणेश जी का सिर चंद्रमा पर सुशोभित हो गया, तभी से चंद्रमा को अर्घ्य देने की मान्यता भी हुई।