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तस्वीरें: नार्थ ईस्ट डेस्टीनेशन में कला-संस्कृति का संगम, मैथ्यू सहेज रहे पांच पीढ़ियों की ये कला

Mon, 25 Nov 2019 09:34 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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नार्थ ईस्ट डेस्टीनेशन में रैंप वाक करतीं युवतियां। - फोटो : अमर उजाला
आईआईटी बीएचयू के तकनीकी ग्राउंड पर चल रहे नार्थ ईस्ट डेस्टीनेशन समारोह में मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश, असम आदि राज्यों से आए कलाकार अलग-अलग प्रस्तुतियों के माध्यम से सांस्कृतिक झलक दिखा रहे हैं। इसमें असम राइफल्स के स्टॉल पर वीर सपूतों की कहानियों के साथ ही जवानों के परिवारीजनों की ओर से तैयार परिधान, सजावटी सामान भी सजाए गए हैं।
 
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कहीं लकड़ी के खिलौने तो कहीं लोक पंरपराओं पर आधारित परिधानों से सजे स्टाल। इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में खान-पान, कलाकृतियों की झलक। इन सभी का संगम आपको इन दिनों देखने को मिल रहा है। खेलकूद की प्रतिस्पर्धाओं के बीच लकड़ी के सामानों से तैयार किए गए सजावटी सामानों की खरीदारी करने वालों की भीड़ लगी रही।
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नार्थ ईस्ट डेस्टीनेशन में दिखी मणिपुर की ब्लैक पौटरी।
मणिपुर लांगपी गांव की हजारों साल पुरानी कला बीएचयू में लगे डेस्टीनेशन नार्थ ईस्ट में अपनी चमक बिखेर रही है। लांगपी पत्थर बर्तन बनाने की बहुत पुरानी कला है। जिसमें अस्सी प्रतिशत काले पत्थर और 20 प्रतिशत मिट्टी का उपयोग किया जाता है। इस हजारों साल पुरानी कला को मणिपुर के उखरूल गांव के मैथ्यू परिवार के लोग पिछले पांच पीढ़ियों से सहेजते आ रहे है।

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दादा-दादी से सीखीं कला
मैथ्यू ने यह कला अपने दादाजी से सीखीं। जब वह एक बच्चे थे, तभी से वह अपने दादा-दादी को ऐसे बर्तन बनाते हुए देखा करते। मैथ्यू के पहले उनके पिता इस खास कला को वहां जिंदा रखने में अहम योगदान निभा चुके है। अपनी पिता की विरासत को आगे बढ़ते हुए मैथ्यू वा उनका पूरा परिवार इसे साथ मिलकर बनाता है। यहीं नहीं इस कला को दूर दराज तक पहुंचाने के लिए मैथ्यू ने लांगपी पॉटरी नाम से एक विलेज पॉटरी का गठन किया।
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जिसका काम इस कला की पॉटरी बनाना और उसकी मार्केटिंग कर विदेशों तक पहुंचाना है। जिससे विदेशों में रहने वाले भी नार्थ ईस्ट के इस हस्तशिल्प के बारे में जान सके। लांगपी हैमलाइ कला से बने रसोई के बर्तन बैंगलोर, मुबंई और दिल्ली में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। यहां तक कि विदेशों में आस्ट्रेलिया और यूके, यूएसए में इसकी मांग बहुत ज्यादा है। इन बर्तनों की कीमत 100 से लेकर 4000 रुपये की है।
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कैसे होता है तैयार 
इनके निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में दो तरह के चट्टानों का इस्तेमाल होता है। एक मौसम और वायुमंडल के प्रभाव से क्षरित हुई चट्टानें और दूसरी सर्पिल चट्टानें। मैथ्यू के अनुसार ऐसी चट्टानें सिर्फ लांगपी में ही मिलती हैं। मिट्टी जैसा गाढ़ापन लाने के लिए इन चट्टानी पत्थरों को पीस कर उसको पानी के साथ 5:3 के अनुपात में मिला लिया जाता है। इस हल्के भूरे मिश्रण को पूरा दिन गूंथने के बाद शुरूआती स्लैब बनाने के लिए एक लकड़ी के तख्ते पर चपटा फैला लिया जाता है।
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अनोखी बात यह है कि लांगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता। हर बर्तंन को सांचों और औजारों की मदद लेकर हाथ से ही आकार दिया जाता है। जिसके बाद उसकों खुली भट्ठी में 1200 डिग्री सेंटीग्रेड से भी ज्यादा तेज ताप में 5से 7 घंटे तक पकाया जाता है।

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मैथ्यू बताते है एल्युमिनियम के बर्तनों के चलन में आने से पहले तांगखुल नागा जनजाति के लोग मुख्य बर्तनों के रूप में काले पत्थर के बडे़-बड़े बर्तनों का ही इस्तेमाल करते थे। एक जमाने में इन बर्तनों को शाही बर्तन भी कहा जाता था। लांगपी हैमलाइ के बर्तन और कड़ाडियों का इस्तेमाल लकड़ी के चूल्हे या गैस स्टोव पर सीधे रखकर खाना पकाने के लिए किया जा सकता है।
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नार्थ ईस्ट डेस्टीनेशन में पूर्वोत्तर राज्यों की कला का संगम आपको बेहद आकर्षक लगेगा। समारोह में पूर्वोत्तर राज्यों से आई युवतियों ने अपने क्षेत्र के परिधानों वेशभूषा पहनकर रैंप वाक किया। तो वहीं प्रदर्शनी में देश से लेकर विदेशी लोग भी खरीदारी करने आए।
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