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छठ महापर्व 2018: इस बार बन रहा दुर्लभ संयोग, पढ़िए अर्घ्य के समय ये योग पूरी करेंगे मनोकामनाएं

Tue, 13 Nov 2018 11:04 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
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छठ पूजा - फोटो : amar ujala
सूर्योपासना के महापर्व छठ व्रत का शुभारम्भ नहाय-खाय के साथ रविवार को हो गया। इस बार इस पूजा में दुर्लभ संयोग बन रहा है। इसलिए इस बार व्रत करने का एक अलग ही माहात्म्य है। पूर्वांचल के विशेष रूप से बिहार प्रांत के इस पर्व को बड़ी श्रद्धा और नियम-संयम के साथ मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार छठ पर्व पर कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं, जो कि शुभ फलदायी व समृद्धिकारक भी है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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छठ पूजा - फोटो : अमर उजाला
खास बात यह है कि रविवार को भगवान सूर्य नारायण देव का ही दिन माना जाता है और इसी दिन से व्रत का श्रीगणेश भी हुआ है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छह दिन उपरांत आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है। सूर्य षष्ठी व्रत वर्ष में दो बार होता है। एक चैत्र माह में और दूसरा कार्तिक माह में। 
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सूर्य को अर्ध्य देने के लिए उमड़ी भीड़ - फोटो : अमर उजाला
इनमें कार्तिक मास के छठ पूजा का विशेष महत्व है। चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया। बीएचयू के ज्योतिष विभाग के प्रो. डॉ. सुभाष पांडेय ने बताया कि सूर्य के कारण ही बादल जल बरसाने में सक्षम होता है। सूर्य अनाज को पकाता है। इसलिए सूर्य का आभार व्यक्त करने के लिए प्राचीन काल से इस क्षेत्र के लोग सूर्य पूजा करते आ रहे हैं। 

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chhath puja
वेदों में भी सूर्य को सबसे प्रमुख देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने बताया कि कई वर्षों बाद छठ पर्व का प्रारंभ रविवार को होने और गुरु की धनु राशि में चंद्रमा और शनि की युति खास संयोग बना रही है।  इस संयोग से लंबे समय से बीमार चल रहे व्यक्ति का स्वास्थ्य बेहतर होगा और नि:संतानों को संतान प्राप्ति का योग बनेगा। वहीं इस वर्ष छठ महापर्व पर शुक्र और सूर्य के एक साथ रहने से महालक्ष्मी की भी कृपा व्रतियों पर बरसेगी।
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chhath - फोटो : अमर उजाला
सूर्योपासना के इस व्रत के करने से व्रतियों के मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इसके साथ ही रक्त दोष व चर्म रोगों का निवारण  हो जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार संतों का अपमान करने के कारण भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने पुत्र प्रद्युम्न को कुष्ठ रोग हो जाने का श्राप दे दिया था। पुन: सभी ने उनसे प्रार्थना की तो उन्होंने भगवान सूर्य के मंदिर का निर्माण कराकर पूजन के लिए शाक्य देश से ब्राह्मणों को बुलाकर पूजन कराया तब जाकर उनके शरीर का कुष्ठ दूर हुआ। तभी से सूर्योपासना  प्रचलित हो गई।
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