ज्योतिषशास्त्र ग्रहों में सबसे क्रूर माने जाने वाले शनिदेव की जयंती गुरुवार को काशी में उत्सवमय माहौल में मनाई गई। इसके लिए काशी के प्राचीन शनिदेव मंदिरों को फूलों, लताओं, रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाया गया। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें..
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- फोटो : अमर उजाला
शनिदेव को रिझाने,मनाने और प्रसन्न करने के लिए गुरुवार को खूब जतन किए गए। कहीं केक कटा तो कहीं फूलों, हरी पत्तियों के वंदनवारों, फूल बंगलों से झांकियां सजाई गईं। शनि देव के मंदिरों में तेल की बाती के दीयों से दीपमालाएं बनाई गईं। तेल के दीप जलाने के लिए शनि के दरबारों में देर रात तक भीड़ उमड़ती रही। तैलाभिषेक के बाद आरती उतारी गई।
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सुंदरपुर के अगिया जोगियाबीर आश्रम परिसर के शनिदेव मंदिर में 11 किलो का केक काटकर गीतों, भजनों से शनिदेव को प्रसन्न किया गया। यहां भव्य झांकी सजाई गई। रंग-बिरंगे गुब्बारों, फूलों से मंदिर परिसर को सजाया गया। शाम 6:30 बजे ढोल, नगाड़ों की गूंज के बीच केक काटकर शनि देव का जन्मदिन मनाया गया। इस दौरान तरह-तरह के खिलौनों, वस्त्रों के अलावा पकवान अर्पित किए गए।
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शनि देव के मंत्रों की गूंज के साथ तैलाभिषेक किया गया। बाल शनि उपासक कन्हैया स्वामी महाराज ने शनि देव को प्रसन्न करने के लिए तैलाभिषेक के साथ ही नारियल, कद्दू की सात्विक बलि भी दिलाई। इस दौरान देर रात तक शनि भगवान के दर्शन और तेल के दीये जलाने के लिए मंदिर में भीड़ लगी रही। विश्वनाथ मंदिर के रेड जोन में स्थित शनिदेव के दरबार में दीपों की अल्पनाएं सजाई गईं।
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अखंड सुहाग की कामना से ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या गुरुवार को वट सावित्री व्रत रखने वाली महिलाओं ने सोलह शृंगार कर सविधि आराधना की। वट वृक्षों की पूजा के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। मंडप बनाकर सविधि मंत्रोच्चार के साथ वट सावित्री पूजन किया गया। इस दौरान हल्दी से रंगे कच्चे धागे के साथ वट वृक्षों की परिक्रमा की गई।
मीर घाट स्थित धर्मकूप पर सुहागिन महिलाओं के समूह सुबह से ही बाजे गाजे के साथ पहुंचने लगे। धर्मकूप परिसर स्थित धर्मेश्वर महादेव के दरबार में रुद्राभिषेक हो रहा था तो दूसरी ओर वट सावित्री के नीचे महिलाएं पौराणिक कथाओं के साथ मंगल गीत गा रही थीं। रंग-बिरंगे फूलों, फलों के साथ पकवानों के भोग अर्पित किए गए। सज धज कर पहुंची महिलाओं ने वट वृक्ष की फेरी लगाई। किसी ने अपनी मनौती के अनुसार सात फेरे तो किसी ने 21, 51, 108 फेरे लगाए।