मोर आजकल जंगल में ही नहीं नाचता। सिविल लाइन जैसे पॉश इलाके में भी अब रोज सड़कों पर झूमता नजर आ रहा है। बेगमपुल के ऊपर तोते उड़ रहे हैं तो चिड़ियों की गुनगुनाहट शहर के हर इलाके में सुनाई दे रही है। कानों में रस घोलती कोयल की कूक हो या फिर बालकनी और घर के आंगन में आकर गुनगनाती नन्हीं चिड़िया का कलरव। ये नजारा आजकल शहर में हर तरफ नजर आ रहा है।
दिल्ली रोड हो या फिर शहर में बेगमपुल जैसा व्यस्त रहने वाला चौराहा। लॉकडाउन के इस एक महीने में इंसान जहां घरों में कैद हुए हैं वहीं, कभी-कभार ही दिखने वाले जीव-जंतु और पंछी बड़ी तादात में नजर आने शुरू हो गए हैं। कोई काॅलोनी, सड़क ऐसी नहीं हैं जहां इन पंछियों का कलरव मन नहीं मोह ले रहा है। गुनगुनाकर...इठलाकर...मानो वे इंसान से कह रहे हों...ये पृथ्वी तुम्हारी ही नहीं हमारी भी है...
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nature photography, birds
- फोटो : amar ujala
पिछले एक महीने से मेरठ ही नहीं, हर जगह का माहौल बदला-बदला है। एक तरफ जहां कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन ने सबको घरों में कैद होने पर मजबूर कर दिया है।
जिस वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण को कोई सरकार खत्म नहीं कर पाई। सबकुछ बंद होने के कारण वह खुद-ब-खुद बहुत कम रह गया है।
एकतरफ जहां जगह-जगह सन्नाटा पसरा है वहीं, इस समय पंछियों का कलरव बहुत बढ़ गया है। कोई जगह ऐसी नहीं जहां पर पंछियों की आवाज मन को न मोह लेती है।
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ऐसा नहीं है कि ये पंछी अचानक कहीं से आ गए हैं। ऐसा भी नहीं है कि एक महीने में इनकी संख्या बढ गई है। फर्क बस इतना है कि उनकी जिंदगी में इंसानी दखल कम हुआ तो वे खुश होकर गुनगुना रहे हैं।
घरों की मुंडेर पर कई तरह की नन्ही चिड़िया फुदक रहीं हैं। वन्य वन्य जीव सलाहकार जीएस खुशरिया बताते हैं कि इंसान का कोलाहल कम होने से इन पंछियों की आवाज के साथ ही मूवमेंट भी बढ़ गया है। वे पहले भी यहीं रहते थे लेकिन इंसान के कोलाहल के कारण वे चुप रहते हैं। डरे रहते हैं।
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वे बताते हैं कि इसको आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि मेरठ में ही कई इलाकों में दिन में ट्रेन की आवाज नहीं आती है। क्योंकि इतना शोर रहता है कि वो सुनाई नहीं देती।
ऐसे ही पंछियों की आवाज कहां सुनाई देगी। जीएस खुशारिया कहते हैं कि हमको इससे सबक लेना चाहिए। पृथ्वी जितनी हमारी है उतनी ही इन जीव-जंतुओं की है।
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पर्यावरण बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि हम पहले पर्यावरण के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानें। धरा दिवस पर्यावरण के बारे में ज्यादा सीखने तथा जानने के लिए आजकल का यह बहुत अनुकूल समय है।
हम किस तरह से पर्यावरण को संरक्षित रख सकते हैं। अधिक से अधिक पौधे लगाएं। प्रदूषण फैलाने से रोकें। छोटे पंछियों के लिए बिल्डिंग सबसे घातक हो गई हैं। ऐसे में लोगों को चाहिए कि छोटे पंछियों के लिए छत और बालकनी में खाने के लिए कंगनी, किनकी चावल और बाजरा डालें।
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जीव-जंतु भी खूब आ रहे बाहर
इंसान का कोलाहल कम होने के बाद पंछी ही नहीं जमीन पर रहने वाले जीव जंतुओं का मूवमेंट भी बढ़ गया है। शहर के तमाम इलाकों में वन्य जीव घरों में भी घुस गए हैं। सीही का मूवमेंट बहुत बढ़ गया है। कई घरों से वन विभाग की टीम ने सीही को रेस्कयू करने के बाद जंगल में छोड़ा है।
इसके अलावा देहात में भी कई जगहों पर हिरण और दूसरे जानवरों का रेस्क्यू किया गया है। डीएफओ अदिति शर्मा बताती हैं कि लोगों का मूवमेंट इतना कभी कम नहीं हुआ। ध्वनि प्रदूषण भी इतना कभी नहीं घटा। ऐसे में वातावरण में बदलाव आने के कारण जीव जंतुओं का मूवमेंट बढ़ा है।
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1970 से मनाया जाता है पृथ्वी दिवस
दुनियाभर में 1970 से हर साल 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस-धरा दिवस मनाया जाता है। यह दिवस अमेरिकी सीनेटर गेलार्ड नेल्सन की दिमाग की उपज है जो कई वर्षों से पर्यावरण को एक बार सभी के लिए राजनीतिक लोक प्रसिद्धि में रखने के लिए एक राह खोजने में लगे थे। ऐसे कई तरीके हैं जिसे हम अकेले और सामूहिक रूप से अपनाकर धरती को बचाने में योगदान दे सकते हैं।
पृथ्वी दिवस के दिन आप कम से कम यह तो कर ही सकते हैं कि ऐसी वस्तुएं न खरीदें जो ज्यादा पैकिंग में आती हो। डिस्पोजल 'लेट या कटलरी' का उपयोग न करें। पॉलीथिन के उपयोग से बचें।
बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वे अपने पुराने खिलौने तथा गेम्स ऐसे छोटे बच्चों को दे दें जो कि इसका उपयोग कर सकते हैं। एक तरह से यह रिसाइक्लिंग प्रक्रिया ही होगी। बच्चे ही नहीं बड़े लोग भी अपने कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा पुस्तकें भेंट कर सकते हैं। अधिक से अधिक पौधे लगाएं।