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#Pulwama: लोगों की जुबानी जानिए कितने दिलेर और नेक दिल इंसान थे शामली के शहीद जवान प्रदीप

Sat, 16 Feb 2019 01:11 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शामली
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शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले 
वतन पर मिटने वालों का यही नामों निशां होगा। 

यकीनन वतन पर मिटने वालों के निशां कभी नहीं मिट सकेंगे क्योंकि वे हर देशवासी के दिल में बसते हैं और हर दिल में उनके लिए प्यार और सम्मान हमेशा बरकरार रहेगा। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए शामली के जवान प्रदीप कुमार का शनिवार सुबह पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। लेकिन उनके परिजनों और आस पास के लोगों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। 
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साथ पढ़े और बचपन में साथ खेले दोस्तों की आंखें साथ बिताए वक्त को याद करके भर आती हैं। क्योंकि उनका वो दोस्त अब कभी लौटकर नहीं आ सकेगा। शहीद जवान प्रदीप के घर पहुंचकर जब अमर उजाला संवादाता ने लोगों से बात की तो हर तरफ से एक ही आवाज आ रही थी। बड़े ही नेकदिल इंसान थे प्रदीप। जी हां आइए इन्हीं लोगों की जुबानी जानते हैं आखिर कैसे था गांव का ये लाड़ला जांबाज जवान: - 

 
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परिजनों के मुताबिक प्रदीप कुमार ने शिक्षा शामली में ही ग्रहण की। उन्होंने वीवी डिग्री कालेज से बीए की परीक्षा पास करने के बाद 2003 में सीआरपीएफ में मथुरा में भर्ती हुए। उनकी ट्रेनिंग बरेली में हुई। 

 

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वर्तमान में उनकी तैनाती जम्मू कश्मीर में हुई थी। शादी होने के डेढ़ साल बाद ही उनकी सीआरपीएफ में नौकरी लग गई थी। शादी के करीब दो-तीन साल बाद से ही वे बच्चों के साथ भले ही गाजियाबाद में रह रहे थे। मगर, बनत से उनका मोह कम नहीं हुआ। जब भी वे छुट्टी आते थे तो यहां भी जरूर आते थे। उनकी लेकर कस्बे में दिनभर लोग चर्चा करते रहे। 

 
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कस्बा निवासी आसिफ खान ने कहा कि प्रदीप बहुत ही मिलनसार और व्यवहार कुशल व नेक दिल इंसान थे। दिनेश कुमार ने कहा कि वे जब भी छुट्टी आते थे, सभी लोगों से मिलते जुलते थे। राजेंद्र सिंह ने बताया कि रास्ते में कोई भी मिला, बिना बोले और हाल-चाल जाने बिना नहीं रहते थे। ओंकार सिंह ने बताया कि उनके बारे में जितना भी कहा जाए, वह कम है। उनकी अच्छाई और व्यवहार हमेशा याद किया जाएगा। वे मेहतनी और काम के प्रति लगनशील रहते थे। 
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कबड्डी के थे अच्छे खिलाड़ी
कबड्डी के भी अच्छे खिलाड़ी थेप्रदीप कुमार पढ़ाई के साथ कबड्डी के भी खिलाड़ी थे। कालेज के दिनों में कस्बे और बाहर कबड्डी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए अपनी टीम के साथ जाते थे। इसके साथ ही उनमें धार्मिक भावना भी कूट-कूटकर भरी थी। नौकरी लगने के बाद दिल्ली से बालाजी तक उन्होंने पैदल यात्रा की। कस्बे से पैदल ही मां शाकंभरी देवी भी दर्शन करने गए थे।
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पत्नी से ढाई बजे हुई थी आखिरी बात
बड़े बेटे सिद्धार्थ ने बताया कि वे गाजियाबाद स्थित आवास से 12 फरवरी को ड्यूटी पर गए थे। 13 फरवरी को जम्मू पहुंचकर उन्होंने अपनी आमद कराई। इसके बाद देर रात में उनकी कानवाई श्रीनगर के लिए निकली थी। 14 फरवरी की दोपहर ढाई बजे उनकी और मम्मी की फोन पर आखिरी बार बात हुई। उन्होंने बताया था कि वे दो-ढ़ाई घंटे में श्रीनगर पहुंच जाएंगे और इसके बाद बात करेंगे। साथ ही उन्होंने मोबाइल की बैटरी कम होना भी बताया था। 
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उन्होंने चार बजे उनके फोन पर कॉल की तो कोई रेस्पांस नहीं मिला। उन्होंने समझा कि बैटरी खत्म हो गई होगी, लेकिन इसके बाद जब टीवी पर पुलवामा हमले की खबर फ्लैश हुई तो उन्हें चिंता होने लगी थी। रात में बनत में उनके दादा जगदीश प्रसाद को बटालियन से उनके शहीद होने की खबर मिली थी। पिता जगदीश प्रसाद ने बताया कि 12 फरवरी को ड्यूटी पर जाने से पहले प्रदीप ने मां को फोन किया था, लेकिन बात नहीं हो सकी थी।
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