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ऐसी मेहमाननवाजी से तो रूठ जाएंगे दूर देश के ये मेहमान, हजारों मील का सफर तय कर पहुंचते हैं भारत 

Sun, 11 Nov 2018 04:12 PM IST
सचिन त्यागी, अमर उजाला, मेरठ
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भारत के परिंदे किसी दूसरे देश नहीं जाते। वे यहीं पैदा होते हैं, यहीं मरते हैं। लेकिन दुनिया में 50 फीसदी परिंदे ऐसे हैं जिन्हें जीने के लिए अपना घर छोड़कर दूर देशों में जाना पड़ता है। भारत में भी हर साल लाखों परिंदे हजारों मील का सफर तय करके आते हैं। यमुना और गंगा के दोआब में चार महीने तक इन परिंदों का कलरव मन मोह लेता है, लेकिन विडंबना यह है कि जल स्रोतों की कमी से ये मेहमान मुंह मोड़ रहे हैं। मेरठ में हर साल की तरह इस बार भी ये परिंदे हमारी मेहमाननवाजी के लिए आ चुके हैं। शोभापुर, सोफीपुर और हस्तिनापुर में ये सुबह-शाम अठखेलियां करते नजर आने लगे हैं। लेकिन अफसोस कि कई सालों से इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। दरअसल यहां तालाब खत्म हो रहे हैं। जो हैं वे जलकुंभी और गंदगी से अटे पड़े हैं। ऐसी ही मेहमाननवाजी रही तो मेरठ में विदेशी परिंदों की आवाजाही बेहद कम हो जाएगी। 
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दुनिया में सिर्फ इंसान ही जिंदा रहने के लिए संघर्ष नहीं करता। इस धरती पर 50 फीसदी ऐसे परिंदें हैं, जो सदियों से एक देश से दूसरे देश में हजारों मील का सफर तय करके दाना तिनका तलाशने आते जाते रहते हैं। हजारों सालों से ये रूस, मंगोलिया, चीन, अफ्रीका जैसे देशों से भारत में चार महीने के लिए रहने आते रहे हैं। उत्तरी गोलार्ध में जब अक्तूबर महीने में बर्फबारी होती है तो वहां से 90 फीसदी परिंदें घर, वनस्पतियों या कीटों के खत्म होने के कारण दूसरे देशों का रुख करते हैं। भारत में इस वक्त नदी-जलाशय भरे रहते हैं। हरियाली होती है। 

 
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ऐसे मौसम में इन परिंदों को यहां वो सबकुछ मिलता है जो इन्हें चाहिए होता है। वैसे तो ये भारत के कई राज्यों में आते हैं, लेकिन इनको ब्रह्मपुत्र, यमुना और गंगा नदी का बेसिन सबसे ज्यादा भाता है। इसके चलते गाजियाबाद, मेरठ, हस्तिनापुर सेंचुरी, ब्रजघाट और बिजनौर बैराज इलाके में अक्तूबर माह के आखिर से इन विदेशी परिंदों का आना शुरू हो जाता है। 70 से 80 प्रजाति वाले ये परिंदे मार्च के पहले सप्ताह तक यहीं रहते हैं और इसके बाद अपने वतन लौट जाते हैं। ठीक उन्हीं रास्तों से जहां से ये पक्षी इस मुल्क में आते हैं, वापसी के लिए उड़ान भर जाते हैं। 

 

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पानी से ऑक्सीजन तक खींच लेती है जलकुंभी 

जलकुंभी पानी में तैरने वाला एक प्रकार का पौधा है। ये मूलत: अमेजन (ब्राजील) का है लेकिन अब पूरे विश्व में फैल गया है। इसके बारे में बताया जाता है कि भारत में इसे सबसे पहले बंगाल में अंग्रेज लेकर आए थे। इसके बाद ये पूरे भारत में फैल गया। इसलिए इसे बंगाल का आतंक भी कहा जाता है। यह पौधा रुके हुए जल में सर्वाधिक बढ़ता है। जल से ऑक्सीजन खींच लेता है, जिसके कारण मछलियां मर जाती हैं। यह जैव विविधता ह्रास का भी एक कारण हैं जो अनेक जलीय प्रजातियों को अपनी उपस्थिति के कारण नष्ट कर देता है। ये बहुत तेजी से बढ़ता है। पूरे पानी में फैल जाते हैं। इसी वजह से जहां ये होता है वहां पर पानी में वाटर बर्ड भी कम आते हैं। परिंदों को आकर्षित करने के लिए इसका हटाया जाना जरूरी है।  
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भारत में 35 साल पहले हुई थी बर्ड रिंगिंग की शुरुआत  

दूसरे देशों से परिंदों के भारत में आने का जिक्र वैदिक समय से है। बाइबिल में भी इसका जिक्र किया गया है, लेकिन इस पर अध्ययन सन 1845 से जर्मन साइंटिस्ट हैंदिंग गाडके ने शुरू किया। 50 वर्ष तक उन्होंने अटलांटिक सागर के हिग्वोलैंड आईलैंड पर रहकर 18 हजार मील की दूरी तय करके उत्तर ध्रुव से माइग्रेट करने वाले परिंदों पर रिसर्च की। 1890 में उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की तो दुनियाभर के वैज्ञानिक चौंक गए। भारत में बर्ड रिगिंग की बात करें तो 35 साल पहले कनार्टक में एक रहस्मयी बीमारी से जानवर मरने लगे। लोगों में भी बीमारी फैलने लगी। वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया तो पता लगा कि जंगल में कॉमन टील नाम की बर्ड विदेशों से आ रही थी। इस पर भारत के वैज्ञानिकों ने यूएस के वैज्ञानिकों को बुलाया तो उन्होंने बर्ड के पैर में रिंग डालकर उसकी ट्रैकिंग शुरू की। पता चला कि ये बर्ड रूस से आती है। रिसर्च के दौरान खुलासा हुआ कि वो बीमारी कॉमन टील के साथ नहीं आ रही थी। बल्कि वो जानवरों में वायरस की वजह से हो रही थी। 
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मेरठ में लगातार घट रही संख्या 

सीनियर आर्नीथालोजिस्ट डॉ. रजत भार्गव बताते हैं कि 15 से 20 साल पहले तक मेरठ में अकेले कैंट क्षेत्र में छह-सात जगहों पर विदेशी पक्षी प्रवास के लिए आते थे। लेकिन अब अतिक्रमण के चलते एक-दो जगह ही ऐसी बची हैं।  तालाब खत्म हो गए। जहां पर बचे हैं वहां पर पॉलीथिन और जलकुंभी से वे अटे पड़े हैं। जलकुंभी पक्षियों-जीवों की सबसे बड़ी दुश्मन है। इसमें पक्षी और मछली फंस जाते हैं। सरकार को चाहिए कि अतिक्रमण वाले तालाबों को कब्जा मुक्त कराकर उनको साफ कराएं। पहले शहाजहांपुर, किठौर, भोला झाल के अलावा 20 जगहों पर विदेशी परिंदे आते थे, लेकिन अब सब खत्म हो रहा है। डॉ. रजत भार्गव बताते हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब ये परिंदे यहां आना बंद कर देंगे।
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फ्लाइवेज होते हैं तय 

फ्लाइवेज बर्ड के अदृश्य आकाश मार्ग को कहते हैं। सदियों से इन्हीं फ्लाइवेज के जरिए विदेशों से बर्ड एक देश से दूसरे देशों में माइग्रेट करते रहे हैं। अमेरिका में बर्ड के सौ फीसदी फ्लाइवेज मैप कर लिए गए हैं। यूरोप में अस्सी फीसदी फ्लाइवेज मैप हैं। लेकिन भारत में अभी तक सिर्फ चार फ्लाइवेज ही मैप किए गए हैं। रिंगिंग के बाद रूट जानने के लिए बर्ड में सेटेलाइट मिनी ट्रांसमीटर लगाए गए। जिससे जीपीएस के जरिए उनके रूट को मैप किया गया। आज बर्ड साइंटिस्ट डेटा लॉगर्स के जरिए इस पर काम कर रहे हैं। 
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मुश्किलें भी नहीं रोक पातीं सफर 

कुछ परिंदे रात को तो कुछ दिन में उड़ते हैं 
ये अपना रूट सूर्य की दिशा और चांद-तारों की स्थिति देखकर तय करते हैं
पर्वत, नदी, वन, झीलों के जरिए जगहों को पहचानते हैं 
उड़ान भरने से पहले ही शरीर में पर्याप्त वसा जमा कर लेते हैं। सफर के दौरान कुछ नहीं खाते। 
40 फीसदी परिंदे सफर में तूफान, बारिश, कड़ी धूप और परभक्षी जानवरों का बनते हैं शिकार 
ऊंची इमारतें, मोबाइल टावर और प्लेन आदि का रहता है खतरा 

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