जो भागवत रूपी रस सिंधु का उत्स था, वह आज उसका नित्य उत्सव है। जहां भक्ति की पावन पवन बहती है। जिसके वातावरण में अखंड यज्ञ का सौरभ बिखरा है। साधु-संतों और भक्तों की कतार, भजनों की मधुर गुंजार और भागवत रूपी अमृत की बरसती फुहार... शुक तीर्थ की इस अलौकिकता से कोई अछूता नहीं रह सकता। यहां आने वाला यहीं का हो जाता है। कोई भजन गाता है, ये तो प्रेम की बात है ऊधौ बंदिगी तेरे बस की नहीं है...। मन आनंद विभोर हो जाता है। साधु-संतों और साधकों का यह प्रिय ठाम है।