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महाभारत सर्किट: संरक्षण में भी हारा ‘बहू हारी’, जहां कौरवों से जुए में द्रोपदी को हार गए थे पांडव

Wed, 04 Mar 2020 04:16 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
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तालाब - फोटो : अमर उजाला
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कौरवों के साथ हुई द्यूत क्रीड़ा में द्रोपदी को हारना पांडवों के लिए शर्मनाक घटना थी। साथ ही महाभारत का बड़ा कारण भी। बिहारी में ‘बहू हारी’ की स्मृतियां ही शेष हैं। जिस तालाब के किनारे कौरवों और पांडवों ने जुआ खेला था, वह सिर्फ नाम का बचा है। वह भी तब जब उसके जल से चर्म रोग दूर होने की मान्यता थी।

 
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इस तालाब के किनारे कौरवों और पांडवों ने खेला था जुआ - फोटो : अमर उजाला
कंच तालाब के नाम पर लोग खेतों के बीच से ले जाकर खेत में ही खड़ा कर देते हैं। वह इसी स्वरूप में बचा है। काफी दूर पैदल चलने के बाद निराशा ही मिलती है। महाभारत काल के महत्वपूर्ण स्थल की ऐसी अनदेखी! वाकई शर्मनाक है। 
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लखौरी ईंटों की पुरानी इमारतें - फोटो : अमर उजाला
मंसूरपुर से करीब आठ किमी दूर बिहारी गांव बहू हारी का अपभ्रंश है। जनश्रुति है कि यहीं तालाब के किनारे हुए जुए में पांडव द्रोपदी को हार गए थे। कहते हैं कि तालाब का शुद्ध जल कांच सा चमकता था। इसलिए यह कंच तालाब के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

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बिहारी गांव - फोटो : अमर उजाला
बिहारी में लखौरी ईंटों की पुरानी इमारतें देखी जा सकती हैं। यह अतिशय क्षेत्र कहा जाता है। यहां  पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर है जिसका इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना है। मंदिर में स्थित 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूल प्रतिमा संवत 1400 की है। दाईं ओर चौबीसी (चौबीस तीर्थंकर) व बाईं ओर भगवान पार्श्वनाथ की छब्बीसी (छब्बीस चिन्ह) हैं। 

 
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लखौरी ईंटों की पुरानी इमारतें - फोटो : अमर उजाला
इतिहासकार विघ्नेश त्यागी से बिहारी के इतिहास की जानकारी मिली। उन्होंने बताया कि बहू हारी का अपभ्रंश ही बिहारी है। पांडव और कौरव द्यूत क्रीड़ा के लिए यहीं आए थे। उन्होंने तालाब के किनारे जुआ खेला जिसमें वे द्रोपदी को हार गए। 
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मंदिर - फोटो : अमर उजाला
नवीन जैन बताते हैं कि 600 साल पहले तालाब की खोदाई में ये सभी प्रतिमाएं निकली थीं। यह अतिशय क्षेत्र है। यहां सर्प का जहर नहीं चढ़ता। भगवान पार्श्वनाथ के सिर पर शेषनाग का छत्र है। उसी वजह से यहां सर्प दंश का असर नहीं होता। 
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आज भी मौजूद हैं साक्ष्य - फोटो : अमर उजाला
मन में कंच तालाब देखने की उत्कंठा थी। गांव के शेरपाल और शुभम हमें लेकर चल दिए। काफी दूर तक खेतों की पगडंडियों पर पैदल चलते रहे। आखिर में उन्होंने एक खेत की ओर इशारा कर दिया। बोले, यही तालाब है। तालाब का स्वरूप तक खत्म हो चुका है। खेत में नाम मात्र का पानी है। देखकर लगता है कि तालाब पर अतिक्रमण हो गया। चर्म रोग से मुक्ति पाने के लिए लोग आज भी इसके जल से स्नान करते हैं और यहां प्रसाद चढ़ाते हैं। 

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तालाब - फोटो : अमर उजाला
युवा शुभम ने बताया, यहां पांडवों और कौरवों ने जुआ खेला था। शेरपाल के अनुसार यह महाभारत कालीन है। तालाब में नहाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। 

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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
जानसठ में हुई थी पांडवों की सभा 
जानसठ में ज्ञानेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर और तालाब है। इस स्थान को भी महाभारत कालीन माना जाता है। जनश्रुति है कि यहीं बरगद के पेड़ के नीचे पांडवों की सभा हुई थी। कुरुक्षेत्र जाने से पहले पांडवों ने इसी स्थान पर बैठकर मंत्रणा की थी। यह ज्ञान स्थल था। जिसका अपभ्रंश जानसठ है। मंदिर में ज्ञानेश्वर महादेव का बहुत छोटे आकार का शिवलिंग है। दूर से देखने पर मंदिर रथ के आकार का प्रतीत होता है। 

मंदिर ट्रस्ट से जुड़े रतन सिंह ने बताया कि पहले यह मठ के रूप में था। मराठा काल में मंदिर बना। पहले तालाब कच्चा था। 2016-17 में नगर पंचायत ने तालाब और इस स्थान का सौंदर्यीकरण कराया। पर्यटन विभाग ने भी इस स्थान के विकास की योजना बनाई है। ज्ञानेश्वर महादेव का शिवलिंग रुद्राक्ष के आकार का है। 
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