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सफलता की 'देवियां', बेटों से बढ़कर हैं बेटियां, पढ़ें ये 10 प्रेरणादायक कहानियां

Wed, 17 Oct 2018 03:45 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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मेरठ न्यूज - फोटो : अमर उजाला
नारी सम्मान और सशक्तिकरण की प्रतीक महाशक्ति का नवरात्र पर्व में चारों ओर पूजन हो रहा है। मंदिरों से घरों तक शक्ति का पर्व मनाया जा रहा है। शहर की बेटियां किसी शक्ति से कम नहीं हैं। ये देवी के साहस रूप का साक्षात प्रतीक हैं, जो मुश्किलों के कांटों पर हंसकर चलती हैं और सफलता के फूल खिलाती हैं। इनका हौसला समाज की हर लड़की में साहस भरता है। ये समाज को शक्ति का अहसास भी कराती हैं।  आज हम आपको मेरठ शहर की ऐसी ही जांबाज बेटियों से रुबरू करा रहे हैं जो किसी भी हाल में बेटों से कम नहीं है:-
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गांव की पहली फौजी बिटिया बनी संगीता

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मेरठ न्यूज - फोटो : अमर उजाला
कक्कपुर गांव सरधना निवासी कौशल त्यागी व प्रेम त्यागी की बेटी संगीता अपने गांव की पहली फौजी बिटिया का खिताब पा चुकी हैं। मेजर संगीता वर्तमान में सेना के विधिक मामलों को संभाली हैं। आरजी कॉलज से बीए व एमए की पढ़ाई के वक्त ही संगीता ने कॉलेज में एनसीसी ज्वाइन कर लिया। यही एनसीसी संगीता के फौज में जाने का आधार बनी। मेरठ कॉलेज से वकालत किया और संगीता मेजर संगीता बन गई। 1999 के कारगिल युद्ध में संगीता दसवीं कक्षा में थी। संगीता कहती हैं सेना का युद्ध में जो समर्पण देखा उसने मुझे प्रेरित किया कि घर की परेशानियों और समाज की रुढ़ियों को भूलकर आगे बढूं। वहीं से मैंने सेना में कदम बढ़ाना शुरू किया। चचेरे भाई के साथ सेना में जाने की तैयारी की। दोनों भाई बहनों का साथ में चयन हुआ। 
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एनसीसी यूनिट हेड कमांडर बनी मोनिका

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शास्त्रीनगर मयूर विहार निवासी उषा शर्मा व स्वर्गीय शिवकुमार शर्मा की बेटी कमांडर मोनिका शर्मा नेवल एनसीसी यूनिट को कमांड कर रही हैं। आरजी पीजी क ॉलेज से पढ़ाई करने वाली मोनिका कहती हैं बचपन से ही सेना में जाने का मन था। पिता एयरफोर्स में थे और हमारे पड़ोसी अंकल की एक बेटी भी सेना में जा चुकी थीं। इनको देखकर मुझे प्रेरणा मिलती कि मैं भी देशसेवा के लिए सेना में जाऊं। मेरठ कॉलेज से स्नातक में प्रवेश लिया, लेकिन वहां लड़कियों की एनसीसी नहीं थी इसलिए कॉलेज छोड़ दिया। केवल एनसीसी लेने के लिए आरजी कॉलेज में आ गई। 2005 में चयन हुआ। ट्रेनिंग केरला एडीमलाह आइएनएस व मुंबई आईएनएस में हुई। पहली पोस्टिंग ओडिसा में मिली। तीनों विंग का पेपर दिया, लेकिन चयन नेवी में यहां। नेवी की एनसीसी यूनिट में 1200 कैडेट्स को सेना के लिए तैयार करती हूं। 

लोन लेकर बनी फैशन डिजायनर

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कनिका ढाका का सपना डिजायनिंग का कोर्स करके फैशन डिज़ायनर बनना है। उनके पिता राजेश ढाका दुकान चलाते हैं। कनिका कहती हैं निफ्ट की परीक्षा पास कर चुकी थी, लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि महंगी पढ़ाई कर सकूं। टूटते ख्वाब को पूरा करने के लिए मैंने एजुकेशन लोन लिया और फाइन आर्ट्स में प्रवेश लिया। अब कनिका एक अच्छी फैशन डिजायनर हैं।
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मुश्किलें नहीं रोक पाईं उड़नपरी की उड़ान

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शारदा रोड निवासी प्रियंका रानी के पिता को गुजरे एक साल हो गया। घर पर छोटे भाई-बहन और मां राजेश्वरी हैं। कॉलेज की पढ़ाई कर रही प्रियंका का सपना सीए बनकर सफलता पाना है। ये बेहतरीन एथलीट भी हैं। स्कूल से ही लोग उसे उड़नपरी बोलते हैं। प्रियंका कहती है करवाचौथ के दिन पिता का देहांत हो गया। इससे बड़ा सदमा हमारे परिवार के लिए कुछ नहीं हो सकता। आर्थिक तंगी से गुजरते परिवार की यह हालत देखकर मुझे लगा कि जितना दौड़ना था दौड़ ली। स्टेट लेवल तक मेडल जीत लिए, अब कुछ नहीं कर पाऊंगी। लेकिन मम्मी की मदद और मेरे हौसले ने मुझे टूटने नहीं दिया। मैंने पढ़ाई और खेल दोनों को काम के साथ जारी रखा है। मैं जानती हूं मेरा जीवन आम लड़कियों जितना अच्छा नहीं, लेकिन जैसा है मुझे पसंद है। 
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शूटिंग की स्वर्णपरी चितवन

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छोटी सी उम्र में जब बच्चियां गुड़ियों से खेलना पसंद करती है, ऐसे में गंगासागर निवासी चितवन पिस्टल से खेलती है और गोल्ड जीतती है। एमआईईटी स्कूल में सातवीं की छात्रा चितवन एयर पिस्टल शूटिंग में नेशनल प्लेयर है। चितवन की मम्मी अलका सिंह कहती हैं मजे-मजे में बेटी ने पिस्टल चलाना सीखा, लेकिन यह इतनी आगे जाएगी हमने सोचा नहीं था। चितवन के पिता प्रशांत कुमार सीसीएसयू में कार्यरत हैं। 2016 में छात्रा ने शूटिंग सीखना शुरू किया और दो साल में ही अच्छा स्कोर बनाया। चितवन ने हाल में ही सब जूनियर वुमन यूथ एयर पिस्टल शूटिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता है। अब नेशनल खेलने अहमदाबाद गई है।
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परिस्थितियों ने तोड़ा सपना, फिर संभली

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शास्त्रीनगर निवासी शिल्पी का सपना इंजीनियर बनने का था। शिल्पी कहती हैं बचपन में जब भी किसी इंजीनियर की कहानी सुनती या उसे देखती तो सोचती कि मैं भी बड़ी होकर इंजीनियर बनूंगी। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने के कारण इंजीनियरिंग की महंगी पढ़ाई नहीं कर पाई। मुश्किल वक्त में जब मेरा सपना टूटा तो खुद को बिखरने के बजाय परिवार को संभाला। मैंने फाइन आर्ट की पढ़ाई शुरू कर दी। 2014 में फैशन डिजायनिंग में अच्छे अंक लाने के लिए यूपीटीयू में रजत पदक से सम्मानित हुईं। शिल्पी कहती है जब हमें कुछ बिना मन के करना पड़े तो मुश्किलें आती हैं मेरे साथ भी वही हुआ। लेकिन हिम्मत साथ थी इसलिए जीतती गई। अब शिल्पी एक सफल फैशन डिजायन है। 

हॉकी स्टिक से बनी पढ़ाई की टॉपर

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आरजी इंटर कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई कर चुकी तनिषा हॉकी की राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। वह हॉकी के मैदान के साथ क्लासरूम में भी विजेता है। एनएएस डिग्री कॅालेज के मैदान पर पिछले 8 सालों से हॉकी की प्रैक्टिस कर रही तनिषा ने यूपी बोर्ड बारहवीं की परीक्षा में 71 प्रतिशत अंक लेकर स्कूल टॉप किया। हॉकी में तीन बार की नेशनल चैंपियन हैं। तनिषा कहती है परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है,  लेकिन मैंने हार नहीं मानी। 

खेल के साथ पढ़ाई का स्वर्ण

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आरजी इंटर कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई कर रही काजल ने विपरीत परिस्थितियों में खेलों के साथ पढ़ाई में भी सोना जीता है। चार बार की नेशनल प्लेयर और स्वर्णपदक जीत चुकी काजल ने दसवीं बोर्ड की परीक्षा में 80 प्रतिशत अंक बिना कोचिंग के हासिल किए। उनके पिता सुभाषचंद्र मजदूरी करते हैं और मम्मी किरन देवी हैं। काजल को हॉकी खेलने का शौक है। 
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साहस के पहियों पर सफलता की उड़ान

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खालसा गर्ल्स इंटर कॉलेज थापरनगर में 11वीं की छात्रा इशिका एक अच्छी खिलाड़ी और मेधावी छात्रा हैं। खैरनगर निवासी इशिका कॉमर्स से पढ़ाई कर रही हैं। इनका सपना परिवार की आर्थिक तंगी को दूर कर छोटे भाई बहनों को अच्छा जीवन देना है। इशिका के पिता ललित सखूजा कंफेक्शनरी की छोटी दुकान करते हैं, मम्मी भी इसमें पिता की मदद करती हैं। इशिका ने स्केटिंग में नेशनल लेवल पर जाकर अपने स्कूल का नाम रोशन किया है।  

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