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ऐसा सम्मान चाहते हैं ये लोकतंत्र सेनानी, बयां की इंदिरा गांधी के 'आपातकाल' की पूरी कहानी...

Tue, 25 Jun 2019 08:11 PM IST
कपिल kapil अशोक मधुप, अमर उजाला, मेरठ
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लोकतंत्र सेनानी - फोटो : अमर उजाला
25 जून 1975 को देश में लगा आपातकाल देश का एक काला अध्याय है। तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल के दौरान विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया। उन पर जुल्म हुए और प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जिसने बोलने का साहस किया, उसे मीसा (मेंटीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) जैसे कठोर कानून में निरुद्ध किया गया। इस कानून में अपील और जमानत और कोई प्रावधान नहीं था। हालात बहुत खराब थे। इंदिरा गांधी के विरुद्ध बोलते भी उस समय आदमी डरता था। जेल जाने वाले के बारे में माना जाता था कि अब इसका राम ही मालिक है। ये जेल से अब मरकर ही निकलेगा। लोकतंत्र सेनानी ने बयां की आपातकाल की पूरी कहानी...! अगली स्लाइडों में पढ़िए-
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आपाकाल 1975 - फोटो : अमर उजाला
वहीं ऐसे हाल में भी बिजनौर जनपद में काफी लोगों ने आपात काल का विरोध किया और सत्याग्रह किए। खराब भोजन को लेकर जेल में आंदोलन किया, लेकिन लोग डरे नहीं। 25 जून को लगी एमरजेंसी में केंद्र सरकार के आदेश पर जिले के 140 राजनीतिक और विभिन्न संगठन के कार्यकर्ताओं को जेल की हवा खानी पड़ी थी। काफी तादाद में कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए तो अनेक ने आंदोलन करते हुए गिरफ्तारी दी। इन 140 में से 48 लोकतंत्र सेनानी आज भी जीवित हैं। सरकार द्वारा इन लोकतंत्र सेनानियों को 20 हजार रुपया प्रतिमाह सम्मान राशि दी जा रही है, किंतु ये केंद्र सरकार से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह सुविधा पाने का इरादा रखते हैं। आपातकाल में डीआईआर (डोमेस्टिक इंसीडेंट रिपोर्ट) और मीसा के तहत कांग्रेस विरोधी राजनीतिक और अन्य संगठन के कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई हुई। डीआईआर में अपील की व्यवस्था थी। आप अपनी बात कह सकते थे, किंतु मीसा में कोई व्यवस्था नहीं थी। जिस पर मीसा लगी वह एमरजेंसी हटने के बाद ही रिहा हुआ।
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विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय बंसल - फोटो : अमर उजाला
19 महीने जेल में बंद रहे चंपत राय बंसल
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय बंसल नगीना के रहने वाले हैं। उनका राजनीतिक सफर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं से प्रारंभ हुआ था। रसायन विज्ञान से एमएससी करने के बाद धामपुर के आरएसएम डिग्री कॉलेज में शिक्षण कार्य किया और लोकप्रियता हासिल की। 1975 आपात काल के दौरान सरकार ने उन्हें मीसा में गिरफ्तार कर बिजनौर कारागार में बंद कर दिया। उसके बाद आगरा कारागार और बाद में बरेली जेल में रखा गया। साढ़े 19 माह तक जेल में रहे।

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लोकतंत्र सेनानी संगठन के जनपदीय सचिव प्रवीण शास्त्री - फोटो : अमर उजाला
प्रवीण शास्त्री ने स्कूल में बांटे थे पर्चे
लोकतंत्र सेनानी संगठन के जनपदीय सचिव प्रवीण शास्त्री बताते हैं कि एमरजेंसी में जिले के 140 लोकतंत्र रक्षक जेल गए। इनमें एक महिला स्वर्गीय चंद्रावती भी शामिल थीं। बाद में वह प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बनीं। जेल जाने वालों में 20 के आसपास विभिन्न संगठनों के मुस्लिम कार्यकर्ता भी थे। 131 पर डीआईआर लगी। 9-10 पर मीसा। डीआईआर वाले तीन से छह माह में रिहा हो गए किंतु मीसा वालों को पूरे आपातकाल में जेल रहना पड़ा।
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आपाकाल 1975
प्रवीण शास्त्री कहते हैं कि वे प्राइमरी की पढ़ाई से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जुड़े हैं। कक्षा आठ की परीक्षा दी ही थी कि एमरजेंसी लग गई। उनके टीचर महेंद्र पाल सिंह आपात काल के विरुद्ध अलख जगाने में लगे थे। उनके कहने पर उन्होंने क्षेत्र में आपत काल के विरुद्ध जनजागरण करने वाले इश्तहार बांटे। कक्षा नौ में धामपुर के आरएसएम में प्रवेश लिया। क्लास के पहले दिन जल्दी जाकर सभी छात्रों की डेस्क में आपात काल विरोधी इश्तहार रख दिए। इसके बाद एक दिन स्कूल प्रांगण में उन्होंने सरेआम इश्तहार बाटें। बाद में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी। उनके टीचर महेंद्र पाल सिंह के कहने पर उस क्षेत्र के लगभग 20 व्यक्ति जेल गए। खुद महेंद्र पाल सिंह और उनके पुत्र उदय राणा को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया।
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लोकतंत्र रक्षक चंद्रवीर सिंह गहलोत - फोटो : अमर उजाला
इंदिरा गांधी के नाम से भी डरते थे लोग
लोकतंत्र रक्षक चंद्रवीर सिंह गहलोत पेशे से वकील हैं। वह कहते हैं कि उस समय इंदिरा गांधी का डर बहुत था, उनके नाम से भी लोग डरते थे। कोई भी कुछ कहते डरता था। प्रत्येक को बोलते समय सोचना पड़ता था कि कोई सुन न लें। कांग्रेसी कहते थे कि जो जेल में है, वे कभी बाहर नहीं निकलेंगे। बिजनौर में एमरजेंसी में जेल जाने वालों पर जुल्म इसलिए नहीं हुए कि सभी राजनीतिक व्यक्तियों के आपस में बहुत अच्छे संबंध थे।
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पत्रकार शिवकुमार शर्मा - फोटो : अमर उजाला
जेल में उपवास रखा तो तन्हाई में डाल दिया
72 वर्षीय पत्रकार शिवकुमार शर्मा कहते हैं कि वे जवानी से संघ से जुडे़ हैं। आपातकाल के दौरान बिजनौर में रहकर वे साइकिल से घूम-घूम कर चाय बेचते थे। चाय झालू से खरीद कर लाते थे। संघ के आह्वान पर उन्होंने तीन साथी रमेश चंद और ब्रह्म स्वरूप के साथ कचहरी में गिरफ्तारी दी। प्रशासन ने उन पर मीसा लगाई। वे 17 माह जेल में रहे। मीसा बंदियों के संगठन के आह्वान पर जेल में तीन दिन उपवास रखा। इस पर जेल प्रशासन ने दबाव बनने के लिए तन्हाई में डाल दिया। बाद में जेल प्रशासन को उनकी मांग माननी पड़ी। उच्चस्तर की सुविधा दी गई। शिवकुमार कहतें हैं कि प्रदेश सरकार उन्हें प्रतिमाह 20 हजार रुपये सम्मान राशि दे रही है किंतु वे चाहतें हैं कि केंद्र सरकार उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा दे और बराबर सुविधाएं प्रदान करे।
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आपातकाल 1975
कविताओं में था इंकलाब का भाव 
जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार भोलेनाथ त्यागी बताते हैं कि दुष्यंत की कविताओं में एक इंकलाब का भाव था। उन्होंने हमेशा अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की। ‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’। उनकी गजलें आज भी देश के समस्त नेता पढ़ते हैं और मंचों से बोलते हैं, लेकिन दुष्यंत की कलम निष्पक्ष और बेबाक रही।

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