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Success: अन्नू रानी ने कभी चंदे से खरीदे थे जूते, गांव की चकरोड़ पर गन्ने का भाला बनाकर करती थींं प्रैक्टिस

Sun, 07 Aug 2022 05:53 PM IST
Dimple Sirohi अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
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अन्नू रानी एथलीट - फोटो : amar ujala
मेरठ से सटे सरधना क्षेत्र के बहादरपुर गांव निवासी अन्नू रानी ने बर्मिंघम में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में जैवलिन थ्रो में कांस्य पदक भारत की झोली में डाल दिया है। अन्नू रानी के ब्रॉन्ज मेडल जीतते ही गांव में खुशी का माहौल है। अन्नू रानी के महिलाओं की जैवलिन थ्रो प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतने पर उत्सव जैसा नजारा है। अन्नू का सबसे बेहतरीन प्रयास 60 मीटर का रहा। वहीं, ऑस्ट्रेलिया की केल्सी ने 64 मीटर की दूरी के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलीट अन्नू रानी से भाला फेंक प्रतियोगिता में देश को गोल्ड की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।

बता दें कि चोटिल होने की वजह से नीरज चोपड़ा प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया था। ऐसे में पदक का पूरा दारोमदार मेरठ की बेटी अन्नू रानी पर था। अन्नू रानी का अपने खेत की चकरोड़ से बर्मिंघम तक पहुंचने का सफर बेहद दिलचस्प रहा है।
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अन्नू रानी के घर पर रखे मेडल - फोटो : अमर उजाला
गन्ने को भाला बनाकर किया भाला फेंक का अभ्यास
जैवलिन क्वीन के नाम से पहचानी जाने वाली अन्नू के संघर्ष की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। गांव की पगडंडियों पर खेलते और गन्ने को भाला बनाकर प्रैक्टिस करने वाली अन्नू एक दिन देश-विदेश में होने वाली प्रतिस्पर्धाओं में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा, लेकिन अपने संघर्ष और कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने ये कर दिखाया। रविवार को वह स्वर्ण जीतने के इरादे से मैदान पर उतरी थी, लेकिन उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया। 
 
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अन्नू रानी के परिजन - फोटो : अमर उजाला
पिता ने रोका तो चोरी से किया अभ्यास
अन्नू रानी तीन बहन व दो भाइयों में सबसे छोटी हैं। उनके सबसे बड़े भाई उपेंद्र कुमार भी 5,000 मीटर के धावक थे और विश्वविद्यालय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी ले चुके हैं। बड़े भाई के साथ अन्नू रानी ने भी खेल में रुचि दिखाई और सुबह चार बजे उठकर गांव में ही रास्तों पर दौड़ने जाया करतीं।

कई बार पिता ने अन्नू खेल में दिलचस्पी नहीं दिखाई तो अन्नू चोरी से अभ्यास करतीं। अन्नू यहां किसी ग्राउंड में नहीं, बल्कि कच्चे संकरे रास्ते जिसे ग्रामीण भाषा में चकरोड़ कहा जाता है, उस पर दौड़तीं। इसी चकरोड़ पर गन्ने को भाला बनाकर वह पहले जोर से फेंकती। उन्होंने यह प्रयास कई महीनों तक जारी रखे।

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अन्नू रानी के घर पर रखे मेडल - फोटो : अमर उजाला
भाई ने किया त्यागा, तो अन्नू ने बढ़ाया मान
अन्नू की खेल में रुचि बढ़ी, तो भाई उपेंद्र कुमार ने उन्हें गुरुकुल प्रभात आश्रम का रास्ता दिखाया। घर से करीब 20 किलोमीटर दूर होने के कारण अन्नू जैवलिन थ्रो का अभ्यास करने के लिए सप्ताह में तीन दिन गुरुकुल प्रभात आश्रम के मैदान में जाती थीं। अन्नू के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि दो खिलाड़ियों पर होने वाले खर्चे को वहन कर सकें, इसे देखकर भाई उपेंद्र ने त्याग किया और बहन को आगे बढ़ाने में जुट गए।
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अन्नू रानी एथलीट - फोटो : अमर उजाला
चंदे की रकम से खरीदे थे जूते
उपेंद्र बताते हैं कि अन्नू के पास जूते नहीं थे, चंदे से इकट्ठा की गई रकम से उसके लिए जूते खरीदे। अन्नू ने अपना अभ्यास जारी रखा और जेवलिन थ्रो में बेहतरीन प्रदर्शन किया। अपने ही रिकॉर्ड तोड़कर वह नेशनल चैंपियन बन गईं। इसके बाद अन्नू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश के साथ-साथ मेरठवासियों भी उनकी जीत की कामना कर रहे थे। 
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जीत के बाद खुशी मनाते अन्नू के परिजन - फोटो : amar ujala
अन्नू की उपलब्धियां:
2021 - टोक्यो ओलंपिक में प्रतिभाग। 
2019 -  वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल में जगह बनाने वाली पहली भारतीय महिला का रिकॉर्ड। 
2019 - एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक।
2017 - एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक। 
2016 - साउथ एशियन गेम्स में रजत पदक। 
2014 - एशियन गेम्स में कांस्य पदक।
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