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दुश्मन के 11 टैंकों पर भारी पड़े थे लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, पाकिस्तानी अफसर ने भी किया था सेल्यूट

Sun, 16 Dec 2018 12:13 PM IST
दुष्यंत शर्मा डिम्पल सिरोही, अमर उजाला, मेरठ
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अरुण खेत्रपाल -17 पूना हॉर्स
भारतीय सेना की जांबाजी के आपने ढेरों किस्से सुने होंगे होंगे। इन्हीं जांबाज सैनिकों में एक नाम है परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल। उन्होंने साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अकेले ही पाकिस्तानी सेना के 7 टैंक ध्वस्त कर दिए थे। उस समय अरुण खेत्रपाल की उम्र थी महज 21 वर्ष। अरुण खेत्रपाल की जांबाजी के कुछ किस्से हम आपको बता रहे हैं जिन्हें जानकार आप भी भारतीय सेना के जवानों पर गर्व करेंगे।

 
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अरुण खेत्रपाल -17 पूना हॉर्स
17वीं पूना हॉर्स रेजिमेंट के थे अरुण खेत्रपाल
अरुण खेत्रपाल भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 की लड़ाई के दौरान 17वीं पूना हॉर्स रेजिमेंट में थे। हर साल सेना 16 दिसंबर के दिन 'बसंतर' की जीत का जश्न मनाते हुए ऐसे वीर जियालों को पुष्प चक्र अर्पित कर उनकी बहादुरी की कहानियां आने वाली पीढ़ी को सुनाती है। रेजीमेंट में तीन दिन तक खास कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इस मौके पर हम आपको 17 पूना हॉर्स के एक वीर नौजवान की जांबाजी की प्रेरणादायक कहानी से रुबरू करा रहे हैं, जिसे अदम्य साहस और पराक्रम के लिए देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान से नवाजा गया। 1971 की जंग में पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर के शकरगढ़ इलाके में घुसने की कोशिश की थी। 16 मद्रास के कमांडिंग ने खबर भिजवाई थी कि एक बड़े हमले के लिए पाकिस्तानी टैंक जमा हो रहे हैं, अगर भारतीय टैंक समय पर नहीं पहुंचे तो उन्हें रोकना मुश्किल हो जाएगा।
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17 पूना हॉर्स रेजीमेंट
भारतीय सेना को पार करनी थी बारुदी सुरंगें
पाक आर्मी की घुसपैठ की खबर के बाद भारतीय सेना ने इस इलाके में प्रवेश किया। उन्हें 1500 वर्ग गज के इलाके को पार करना था जिसमें बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं। जैसे ही पाकिस्तानियों ने जवाबी हमला शुरू किया। 17 पूूना हॉर्स केबी-स्क्वाड्रन के कमांडर ने पीछे से और टैंक भेजे जाने की मांग की। कैप्टन मल्होत्रा, लेफ़्टिनेंट अहलावत और सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को केबी स्क्वाड्रन की मदद के लिए भेजा गया। 16 दिसंबर की सुबह पूना हॉर्स के टैंक एक लाइन बनाते हुए आगे बढ़ गए।

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Arun khetrpal
दुश्मन के 11 टैंकों से अकेले करना था सामना

मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना के 14 टैंक थे और भारतीय जवानों के पास थे सिर्फ 3 टैंक। टैंकों की संख्या के लिहाज से देखें तो मुकाबला गैर बराबरी का था लेकिन अरुण खेत्रपाल और उनके साथियों को खुद पर भरोसा था। उन्होंने खुद को लड़ाई में झोंक दिया। देखते ही देखते भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सेना के 3 टैंक मार गिराए।

मुकाबला 11 और 3 टैंकों के बीच हो गया। इस बीच भारत के 3 टैंकों में से 1 ध्वस्त हो गया। दुर्भाग्यवश दूसरे में खराबी आ गई। दुश्मन के पास 11 टैंक थे और भारत के पास केवल एक टैंक बचा था। अरुण खेत्रपाल इसी टैंक पर सवार थे।
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अरुण खेत्रपाल
‘मेरी बंदूक अभी भी काम कर रही है, आई विल गेट देम…..
अरुण खेत्रपाल ने पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। दुश्मन के दो और टैंक नष्ट कर दिए। अचानक एक गोला अरुण खेत्रपाल के टैंक पर आ गिरा। टैंक में आग लग गई। रेडियो सैट पर उनका कमांडर उन्हें निर्देश दे रहा है कि अरुण टैंक को छोड़कर बाहर आ जाओ। लेकिन अरुण जवाब देते हैं ‘मेरी गन अभी भी काम कर रही है…आई विल गेट देम…..’ और इसके बाद वह रेडियो सैट बंद कर देते हैं। इसके बाद अरुण ने एक के बाद एक चार पाकिस्तानी टैंक ध्वस्त किए। उनकी जांबाजी देख पाकिस्तानी टैंक मैदान छोड़कर भागने लगे। 

 
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Arun khetrpal
आखिरी सांस तक लड़ते रहे खेत्रपाल
इस लड़ाई में कुछ ही गज की दूरी पर थे कर्नल एसएस चीमा। उनके अनुसार, ‘जिस आख़िरी टैंक पर अरुण ने निशाना लगाया वो पाकिस्तान के स्क्वाड्रन कमांडर का टैंक था। खेत्रपाल ने उस टैंक पर निशाना लगाया और पाकिस्तानी टैंक ने भी खेत्रपाल के टैंक पर फायर किया।

पाकिस्तानी कमांडर तो कूद कर बच गया लेकिन खेत्रपाल के टैंक पर एक बम गिरा और उसमें आग लग गई। अरुण अपने टैंक से बाहर नहीं निकल पाए और वहीं उन्होंने दम तोड़ दिया। अरुण खेत्रपाल के साथ टैंक में बैठे रिसालदार मेजर नत्थू सिंह भी इस युद्ध में तैनात थे। वह बताते हैं कि अरुण कितने बहादुर थे।

वे हमले की परवाह न करते हुए आगे बढ़ रहे थे और सिर्फ उनका मकसद था की वह ज्यादा से जयादा पाकिस्तानी टैंकों को तबाह कर दें। पाकिस्तानी कमांडर ने निशाना लगाया जो खेत्रपाल के टैंक पर गिरा। ये धमाका इतना तेज था कि अरुण की आंतें तक बाहर आ गई थीं लेकिन वह ऐसा वीर था जिसने हार नहीं मानी।

 
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17 पूना हॉर्स रेजीमेंट
पाकिस्तानी सेना के अफसर ने अरुण के पिता को कहा, मैं आपके बेटे को सेल्यूट करता हूं
अरुण के शहीद होने के बरसों बाद उनके पिता ब्रिगेडियर एमएस खेत्रपाल पाकिस्तान स्थित जन्मभूमि सरगोधा गए। लाहौर में एक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नासेर ने अपने घर में ठहराया। और उन्हें कहा कि 16 दिसम्बर 1971 की सुबह आपका बेटा मेरे हाथों ही मारा गया था। मैं और वह आमने-सामने थे।

वह अपने देश के लिए लड़ रहा था और मैं अपने देश के लिए। आपका बेटा बहुत बहादुर था। हम दोनों ने साथ-साथ एक दूसरे पर निशाना लगाया था लेकिन भाग्य से मैं बच गया और उसे दुनिया से जाना पड़ा। यह तो मुझे बाद में पता चला कि उस समय वह सिर्फ 21 साल का था। मैं आपके बेटे को सेल्यूट करता हूं। आपको भी सेल्यूट करता हूं। आपकी परवरिश ने ही उसे इतना बहादुर बनाया। 
 

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कमांडर हनूत सिंह
कमांडर ने युद्ध में शामिल करने से कर दिया था इन्कार
अरुण मोर्चे पर पहुंचे तो उनके कमांडर हनूत सिंह ने उन्हें लड़ाई में शामिल करने से मना कर दिया क्योंकि वह यंग ऑफ़िसर्स कोर्स पूरा नहीं कर पाए थे। अरुण ने यह कह कर उन्हें मनाया कि अगर वह इस युद्ध में भाग नहीं ले पाए तो शायद ही उन्हें अपने जीवन के दौरान युद्ध में शामिल होने का मौका मिल पाएगा। कर्नल हनूत सिंह मान तो गए लेकिन अरुण को निर्देश दिया कि उनके साथ एक वरिष्ठ सूबेदार भेज रहा हूं और हर मामले में वह सूबेदार की सलाह लें। लेकिन एक्शन शुरू होने के एक घंटे के अंदर ही उस सूबेदार के सिर में गोला लगा और वह शहीद हो गए।

 

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अरुण खेत्रपाल
लाहौर में गोल्फ खेलूंगा और जीत की पार्टी में पहनूंगा ब्लू सूट
अरुण उस समय अहमदनगर में यंग ऑफिसर्स कोर्स कर रहे थे जब उन्हें रेजिमेंट में भेजने का फैसला लिया गया। रास्ते में दिल्ली में वह कुछ देर के लिए अपने घर पर रुके। मोर्चे के लिए रवाना होने से पहले अरुण ने एक नीला सूट और गोल्फ स्टिक भी अपने सामान में रखी। पिता ने पूछा तुम लड़ाई पर जा रहे हो वहां इनका क्या करोगे।  अरुण ने कहा, मैं लाहौर में गोल्फ़ खेलूंगा और, जीत के बाद डिनर पार्टी तो होगी ही…, तब ये नीला सूट पहनूंगा। इसलिए ये सब ले जा रहा हूं।’
 

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अरुण खेत्रपाल
बस नहीं आई तो स्कूल से तीन किलोमीटर पैदल चलकर पहुं गए घर
अरुण खेत्रपाल कभी घबराए नहीं। छोटी उम्र में भी नहीं। उस वक्त वह सिर्फ सात वर्ष के थे। स्कूल से उन्हें घर जाना था लेकिन गाड़ी आई नहीं। वह अपना और अपने छोटे भाई का बैग कंधे पर लादकर घर की तरफ चल दिए। घर तीन किलोमीटर दूर था। रास्ते में छोटा भाई कई बार रोया लेकिन उसे समझा बुझाकर वह घर तक पहुंच गए। 
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अरुण खेत्रपाल
गरीब बच्चे को दे दिया था अपना स्वेटर
अरुण सिर्फ साहसी ही नहीं, दयालु भी थे। स्कली दिनों में सर्दियों में उन्होंने अपना स्वेटर एक गरीब बच्चे को दे दिया था क्योंकि उसके पास स्वेटर नहीं था।  

(फोटो :फाइल )
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