तीर्थनगरी मथुरा के नंदगांव में मंगलवार को लठामार होली की धूम रही। जैसे ही घड़ी ने शाम के चार बजाए बरसाना के पारंपरिक वेशभूषा में सजे धजे हुरियारे नंदभवन की ओर आते दिखाई दिए। उनके हाथों में ढाल और सिर पर पगड़ी सजी थी। उनके वृषभानु के जमाई के गगनभेदी जयघोष से क्षेत्र गुंजायमान हो उठा।
कान्हा के गांव की तंग गलियों से होते हुए वह नंद भवन तक पहुंचे। हुरियारों ने पहले कृष्ण-बलराम के दर्शन किए। उन्होंने नवमी के दिन बरसाना में खेली गई होली का फगुवा (उपहार) न देकर आने का उलाहना भी दिया। वह फगुवा दै मोहन मतवारे... फगुवा दै का गायन कर रहे थे।
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होली खेलने को तैयार नंदगांव के हुरियारे
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
इस मौके पर नंदगांव में ड्रमों में पहले से तैयार टेसू के फूलों के रंग से बरसानावासियों का जोरदार स्वागत किया गया। एक ओर नंदगांव के ग्वाल थे, तो दूसरी ओर बरसाना के हुरियारे। इसके साथ ही समाज गायन का दौर शुरू हुआ। मंदिर प्रांगण में मौजूद हर किसी का ध्यान समाज की ओर चला गया। गुलाल के सतरंगी बादल घुमड़-घुमड़ कर नंदभवन पर मड़राने लगे। ढप-ढप, ढोल की थाप पर लोग थिरकने लगे।
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हुरियारिन की लट्ठ के वार से बचाव करता हुरियारा
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
दोपहर करीब दो बजे से ही बरसाना से राधारानी सखी स्वरूप हुरियारों का आगमन शुरू हो गया। यशोदा कुंड पर चकाचक रबड़ी, केसरयुक्त भांग ठंडाई छानी गई। नंदगांव के लोगों ने उनका भव्य स्वागत सत्कार किया। जैसा कि पहले से अंदेशा होता है कि लाठियां बरसने वाली हैं। इसके लिए यशोदा कुंड पर सिर पर पगड़ी बांधी गई।
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हुरियारों के स्वागत को तैयार हुरियारिनें
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
यशोदा कुंड से बाहर निकलकर हुरियारे एकत्रित हुए। ढालों को उपर करते हुए नंद के जमाई की जय... के गगनभेदी जयघोष करते हुए भूरे का थोक से नंदभवन की ओर कूच किए। इससे पहले भूरे का थोक में गुलाब की पंखुड़ियों से जोरदार स्वागत किया गया। हुरियारों की राह में कुंतलों फूल बिछाए गए। जगह-जगह फूलों से रंगोली सजाई गई।
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नंदगांव की लठामार होली का दृश्य
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
छतों से ड्रमों में पहले से तैयार किया गया टेसू के फूलों का प्राकृतिक रंग हुरियारों पर बरसाया गया। हर कोई अद्वितीय प्रेम के इस रंग में सराबोर होने के लिए मचल रहा था। हुरियारों के झुंड के झुंड हुरियारिनों से इशारा कर-करके कह रहे हैं कि दर्शन दै... निकस अटा में ते... दर्शन दै।
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लाटी की वार बचाता हुरियारा और दूसरा रंग से सराबोर
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
लहंगा चुन्नी और सोलह शृंगारों से सजी धजी हुरियारिनें अपने घर के द्वार, अटा, अटरियाओं के झरोखों से झांकने लगीं। भंग की तरंग में मद मस्त हुरियारे हंसी ठिठोली करते हुए नंदभवन पहुंचे। नंदभवन में पहुंचते ही पहले से ताक में बैठे नंदगांव के ग्वालों ने बरसाना के हुरियारों पर पिचकारी, बाल्टियों से टेसू के फूलों के रंग से उनको सराबोर कर दिया।
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होली रसिया गीतों पर नृत्य करते हुरियारे और हुरियारिन
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
चारों ओर नंदभवन में विभिन्न रंगों की सतरंगी छटा छा गई। नंदगांव बरसाना के समाजियों ने कृष्ण-बलराम के विग्रहों के सामने संयुक्त समाज गायन किया। इस दौरान वह 'बरसाने की गोपी फगुवा मांगन आईं... कियौ जुहार नंद जू कौं भीतर भवन बलाईं... फगुवा मिस ब्रज सुंदरी जसुमति ग्रह आईं... तब ब्रजरानी बोल कैं रावर में लीनी' आदि पदों का गायन किया।
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हुरियारों पर लट्ठ बरसातीं हुरियारिनें
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
इन तमाम परंपरागत रीति-रिवाजों के बाद शुरू होती है विश्व प्रसिद्ध लठामार होली। शाम के करीब साढ़े पांच बजे रंगीली चौक पर हजारों की संख्या में हुरियारे और हुरियारिनें जमा हुए। इसके बाद उन्होंने नृत्य और गायन प्रस्तुत किया। 'चंदा छिपमत जईयौ आ... श्याम संग होरी खेलूंगी... नैनन में मोहे गारी... दई पिचकारी दई होरी खेली न जाए।
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हुरियारों पर लट्ठ बरसातीं हुरियारिनें
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
इस तरह के तमाम लोकगीतों पर हुरियारे और हुरियारिनों ने नृत्य करते हुए कन्हैया की अलौकिक लीला में मगन हो गए। संध्या को समाजियों का आदेश हो जाने पर प्रेम भरी लाठियों की बरसात शुरू हो गई। बीच-बीच में वहां पर मौजूद अन्य भक्तों पर भी प्रेम पगी लाठियां दुलार दिखाती रहीं। लोग छतों से यह नजारा देख लालायित हो रहे थे।
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नृत्य करतीं हुरियारिनें
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
...तो इसलिए मनाई जाती है नंदगांव में लठामार होली
नंदगांव की लठामार होली का अपना अलग महत्व है। कृष्णकाल में भगवान श्री कृष्ण 'फागुन सुदी नवमी' को होली खेलने बरसाना गए। बिना फगुवा (नेग )दिए ही वापस लौट आए। बरसाना की गोपियों ने कन्हैया से होली का फगुवा लेने के लिए नंदगांव जाने की सोची।
लाठी से हुरियारों का स्वागत करतीं हुरियारिनें
- फोटो : चंद्रकांत शुक्ला
इसके लिए राधाजी ने बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया। बताया कि कन्हैया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। बस फिर क्या, अगले दिन ही यानि दशमी तिथि को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा लेने नंदगांव पहुंच जाती हैं।