विडंबना यह है कि स्वतंत्रता दिवस से पहले सरदार अली खां के वंशज मुख्तार अहमद खां कुछ युवाओं की मदद से मजार और उसके आसपास सफाई अभियान चलाते हैं। धूल हटाई जाती है, परिसर को साफ करने की कोशिश होती है, लेकिन मजार पर जमी सीलन, काई और वर्षों की धूल के निशान उपेक्षा की कहानी फिर सामने रख देते हैं। ऐसा लगता है जैसे इतिहास का एक अध्याय किसी बंद कमरे में रखी पुरानी किताब की तरह है जिसे कभी-कभार खोला जाता है, धूल झाड़ी जाती है और फिर उसी अंधेरे में छोड़ दिया जाता है।
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क्रांतिकारी शरदार अली के बारे में जानकारी देते उनके वंशज मुख्तार खान
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
घोष कंपनी से नखास और माया बाजार की ओर जाती संकरी गलियों के बीच स्थित कोतवाली खुर्द का कोतवाली पुलिस स्टेशन महज दर-ओ-दीवार से बना एक भवन नहीं है। इसकी दीवारों और जर्रे-जर्रे में 1857 की क्रांति के उन बलिदानियों की कहानी जैसे आज भी सांस लेती है, जिन्होंने गोरक्षनगरी की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था।
इसी परिसर में सरदार अली खां, उनके समर्थकों और परिवार के सदस्यों के बलिदान की स्मृतियां दफन हैं। जहां जीवन बीता, वहीं मौत के बाद बना ठिकाना। इतिहास के उस रक्तरंजित दौर में सरदार अली खां और उनके साथियों ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा लिया।
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क्रांतिकारी शरदार अली के बारे में जानकारी देते उनके वंशज मुख्तार खान और शरदार अली की मजार
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संघर्ष का अंत उनकी शहादत और परिवार पर हुई कार्रवाई के साथ हुआ। कहते हैं, जिन्हें इसी शहर में पाला-पोसा गया, उनकी सांसें भी इसी शहर में थमीं और मौत के बाद उन्हें इसी परिसर में दफन कर दिया गया। आज यहां उनकी मजार मौजूद है, लेकिन आजादी के अमृत महोत्सव और स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसरों पर देश अपने शहीदों को याद करता है पर इस मजार तक पहुंचते-पहुंचते उत्सव का शोर जैसे अचानक थम जाता है।
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क्रांतिकारी शरदार अली के आवास से खुदाई में मिले सिक्के उनके वंशज सुरक्षित रखे हुए हैं
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बहादुर शाह जफर की पंक्तियां याद आती हैं
कोतवाली परिसर में मजार तक पहुंचने के बाद अनायास ही बहादुर शाह जफर की वह मशहूर पंक्ति याद आती है,
“पसे-मर्ग मेरी मजार पर जो दिया किसी ने जला दिया,
उसे आह! दामन-ए-बाद ने सरेशाम ही से बुझा दिया।”
मानो इन पंक्तियों में सरदार अली खां और उनके परिवार की सदियों पुरानी बेबसी आज भी आवाज पा रही हो। किसी अपने ने मौत के बाद कब्र पर याद का एक दिया तो जलाया, लेकिन उपेक्षा की तेज हवा ने शाम होने से पहले ही उसे बुझा दिया।
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कोतवाली के इसी जगह मजार बनी है
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
स्वतंत्रता दिवस से पहले सफाई, उसके बाद वही अंधेरा
विडंबना यह है कि स्वतंत्रता दिवस से पहले सरदार अली खां के वंशज मुख्तार अहमद खां कुछ युवाओं की मदद से मजार और उसके आसपास सफाई अभियान चलाते हैं। धूल हटाई जाती है, परिसर को साफ करने की कोशिश होती है, लेकिन मजार पर जमी सीलन, काई और वर्षों की धूल के निशान उपेक्षा की कहानी फिर सामने रख देते हैं।
ऐसा लगता है जैसे इतिहास का एक अध्याय किसी बंद कमरे में रखी पुरानी किताब की तरह है जिसे कभी-कभार खोला जाता है, धूल झाड़ी जाती है और फिर उसी अंधेरे में छोड़ दिया जाता है। मुख्तार अहमद खां बड़े गर्व से कहते हैं कि हम सरदार अली खां की पांचवीं पीढ़ी हैं।
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कोतवाली थाना स्थित क्रांतिकारी शरदार अली की मजार।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
चंद मिनट की खामोशी के बाद कहते हैं कि चिंता बस इतनी है कि मेरी उम्र 80 साल हो चुकी है। कब जाने बुलावा आ जाए...मेरे बाद कौन दिया जलाएगा इस मजार पर दीया।
वे कहते हैं कि जब भी मैं यहा आता हूं ये मजार तो खामोश रहती है, फिर भी एक सवाल यहां गूंजता है कि जिस आजादी के लिए हमने अपने वीरों का बलिदान स्वीकार किया, उनके नाम पर सिर्फ श्रद्धांजलि के दो शब्द से आगे नई पीढ़ी के लिए विरासत को सहेजना जरूरी है। मानो वह कह रही हो कि एक स्मारक के हकदार तो हम भी हैं।
कोतवाली थाना स्थित क्रांतिकारी शरदार अली की मजार
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आइए जानते हैं सरदार अली के योगदान को
डॉ. कृष्ण कुमार पाण्डेय पुस्तक रियासत ए गोरखपुर में लिखते हैं कि 18वीं और 19वीं सदी के ऐतिहासिक विवरण एवं तत्कालीन ब्रिटिश अभिलेखों से ज्ञात होता है कि 1857 ई. में अवध नवाब के प्रतिनिधि के रूप में सैयद शाह गुलाम के पुत्र सैयद विलायत अली 'सब्जपोश' के अतिरिक्त मुअज्जम अली खां थे। मुअज्जम अली खां के पुत्र सरदार अली गोरखपुर में नवाब अवध के रिसालदार एवं बड़े जमींदार थे।
1858 में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा गोरखपुर पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किए जाने के बाद सरदार अली खां और रमजान अली खां के परिवार पर अंग्रेजी कार्रवाई का विवरण मिलता है। 15 अप्रैल 1858 को अंग्रेजी सैनिकों ने उनकी हवेली पर धावा बोला। परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी गई और सरदार अली खां तथा रमजान अली खां को उनके ही घर में फांसी दिए जाने की बात कही जाती है।