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जानें, आखिर क्यों विलुप्त होती जा रही है ये चिड़िया

Tue, 21 Mar 2017 07:08 AM IST
दिलीप सिंह, अमर उजाला, कानपुर
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गौरैया चिड़िया
घर-आंगन में अब इनका चीं-चीं का शोर भी खत्म होता जा रहा है। घर की छतों और मुंडेरों से गौरैया चिड़िया गायब है। सभी को हैरत है कि अपनी चहचहाहट से घरों का सन्नाटा तोड़ने वाली गौरैया आखिर गईं तो कहां गईं? कुछ कहते हैं कि मोबाइल फोन के टावरों से पैदा होने वाले रेडिएशन ने गौरैया को गायब कर दिया है। कुछ का कहना है कि जैविक खेती का चलन लगभग खत्म होने से इनका खात्मा हुआ है। खैर इन सबके बीच शहर के कई लोग ऐसे हैं, जो गौरैया के वजूद को बचाए हुए हैं। विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) के मौके पर हम आपको इससे जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहे हैं।  
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प्रकाश कुमार
आत्म सुख के लिए गौरैया संरक्षण
कानपुर किदवई नगर साइट नंबर वन रहने वाले प्रकाश कुमार एसबीआई से सीनियर स्पेशल असिस्टेंट के पद से रिटायर्ड हैं। अब उनकी जिंदगी का मकसद सिर्फ गौरैया सेवा और उनका वंश बढ़ाना है। प्रकाश कुमार बताते हैं कि उन्होंने घर में ही 40 से अधिक अलग-अलग तरह के घोंसले बना रखे हैं। इसमें कई गौरैया रहती हैं और अपना वंश भी बढ़ा रही हैं। उन्होंने अपने घर ही नहीं अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के घर में भी घोंसले लगवाए हैं। प्रकाश ने बताया कि गौरैया की सेवा अपने आत्मिक सुख के लिए करते हैं।
गौरैया के लिए जरूरी 
- सुरक्षित स्थान पर गौरैया के लिए घोंसले बनाएं। ताकि उसके अंडे न गिरें और दूसरे पक्षी हमला भी न कर सकें।
- आटे की गोलियां, लइया, बाजरा, पका चावल, पराठे, पूड़ी के टुकड़े गौरैया को खिलाए जा सकते हैं।
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गौरव बाजपेयी
कानपुर गोविंद नगर बी-ब्लॉक में रहने वाले गौरव वाजपेयी ने गौरैया को बचाने का अभियान चला रखा है। बीएससी, एमए, एलएलबी और एलएलएम पास गौरव ढाई साल में अलग-अलग घरों में 3500 से अधिक  घोंसले लगवा चुके हैं। स्कूल, कॉलेज में गौरैया बचाने के लिए समय-समय पर सेमिनार करते हैं। कई स्कूल और कॉलेज में घोंसले लगवाए भी हैं। 
क्यों विलुप्त होती जा रही गौरैया
कानपुर चिड़ियाघर के निदेशक दीपक कुमार (आईएफएस) ने बताया कि मोबाइल टावर के रेडिएशन इसकी बड़ी वजह है। गौरैया अंडे तो देती हैं, लेकिन टावर की तरंगों के दुष्प्रभाव से बच्चे पैदा नहीं हो पाते हैं। इसके साथ ही आज के घरों में झरोखे और छप्पर खत्म हो गए हैं। इससे गौरैया घरों में अपना आशियाना नहीं बना पाती है। इसके अलावा दाना-पानी नहीं होने से भी गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है।

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मनीष पांडेय
गौरैया के लिए दाना-पानी अभियान 
कानपुर जीटी रोड शिवकटरा मोड़ के पास रहने वाले मनीष पांडेय पेशे से कारोबारी हैं। इन्होंने शहर भर में गौरैया के लिए ‘दाना-पानी’ अभियान छेड़ रखा है। अभियान के जरिये लोगों से अपील करते हैँ कि गौरैया संरक्षण के लिए घरों में घोंसला लगाए और दाना और पानी भी रखें। कुछ दिन में ही सैकड़ों गौरैया आपकी छत पर चहचहाने लगेंगे।
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लोगों के बीच रहती है गौरैया
लोगों के बीच रहती है गौरैया
गौरैया एक ऐसी चिड़िया है जो लोगों के बीच रहती है। यह आवासीय इलाकों में अपने घोंसले बनाती है।
गौरैया बचाने को नहीं कोई सरकारी योजना
डीएफओ एसएस श्रीवास्तव की मानें तो गौरैया को बचाने के लिए कोई भी सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है। इसलिए वन विभाग खुद ही गौरैया के प्रति लोगों को जागरूक करता है कि गौरैया के लिए छतों पर दाना-पानी और घोंसले बनाएं। ताकि गौरैया का सफल प्रजनन भी हो सके।
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