यूपी की राजनीति और भाजपा में अच्छी पकड़ होने और लगातार चार बार विधायकी झोली में आने से कुलदीप सेंगर के रुतबे और दबाव में पुलिस ने सही, गलत में फर्क नहीं किया। किशोरी ने न्याय के लिए कानून का दरवाजा खटखटाया तो ‘सिस्टम’ ने उसे इस मोड़ पर पहुंचा दिया कि वह जिंदगी मौत के बीच झूल रही है।
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कुलदीप सिंह सेंगर पर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली किशोरी (फाइल फोटो)
- फोटो : amar ujala
पीड़िता के पिता की मौत ने तहस नहस कर दिया कुलदीप का साम्राज्य
मामले में विधायक के साथ पुलिसकर्मियों को भी जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा। अब मामला फिर सुर्खियों में है। पुलिस में दर्ज मुकदमे के मुताबिक चार अप्रैल 2018 को दुष्कर्म पीड़िता के पिता को विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के भाई जयदीप उर्फ अतुल सेंगर ने सहयोगियों के साथ इस कदर पीटा कि वह मौत की कगार पर पहुंच गया।
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कुलदीप सिंह सेंगर (फाइल फोटो)
- फोटो : amar ujala
विधायक के दबाव में काम करने पर कई पुलिसकर्मी हुए थे निलंबित, दो गए थे
इलाज की जगह पुलिस ने आर्म्स एक्ट का मुकदमा दर्ज कर उल्टे उसे ही सलाखों के पीछे डाल दिया। बेरहमी से हुई पिटाई में पिता की 8 अप्रैल 2018 की रात मौत हो गई। पीड़िता के पिता की मौत के बाद सब बदल गया। यहीं से मामले ने करवट बदला और विधायक व उसके भाई समेत कानून को ताक पर रखकर विधायक की पैरोकारी करने वाले पुलिस कर्मियों को जेल जाना पड़ा था।
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कुलदीप सिंह सेंगर एवं दुष्कर्म पीड़िता (फाइल फोटो)
उच्चाधिकारी लेते सबक तो दोबारा न होती खाकी की किरकिरी
सफीपुर के तत्कालीन सीओ कुंवर बहादुर सिंह, एसओ अशोक भदौरिया, बीट प्रभारी कामता प्रसाद सिंह, हेड कांस्टेबल हेड कांस्टेबल रामराज शुक्ला, कांस्टेबल लक्ष्य कुमार शुक्ला, मोहित कुमार सहित दो अन्य को निलंबित किया गया, जबकि झूठा मुकदमा दर्ज कर पीड़िता के पिता को जेल भेजने वाले एसओ अशोक भदौरिया व कामता प्रसाद पर मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा गया।
कुलदीप सिंह सेंगर एवं दुष्कर्म पीड़िता (फाइल फोटो)
सबक लेते तो फिर सुर्खियों में न आता मामला
दुष्कर्म कांड में एसओ और बीट प्रभारी को जेल भेजे जाने के बाद भी पुलिस के उच्चाधिकारियों ने सबक नहीं लिया। कुछ दिन तो पुलिस ने सतर्कता बरती पर जैसे-जैसे मामला ठंडा पड़ा, पुलिस फिर से अपने ढर्रे पर लौट आई। हाईकोर्ट के निर्देश पर पीड़िता को दी गई सुरक्षा में पहले चूक शुरू हुई फिर पीड़िता और उसके परिवार को सुलह के लिए धमकाने वालों को नजरअंदाज कर दिया गया। यहां तक कि पीड़िता व उसके परिजनों की ओर से दिए गए शिकायती पत्रों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।